सामान्य स्त्री के लिए नई सार्वजनिकता का निर्माण

कर्णाटक में हाथ से बने उत्पादों के पक्ष में प्रसन्ना जी के नेतृत्व में ग्राम सेवा संघ एक आन्दोलन चला रहा है. इस आन्दोलन के तहत बंगलुरु स्थित रागी कणा में प्रत्येक रविवार को हाथ से निर्मित उत्पादों का बाज़ार लगता है. इस बाज़ार में वस्त्र, खाद्य, सब्जी, फल, अनाज, हस्तशिल्प आदि तरह-तरह के सामान मिलते हैं और इस बाज़ार के साथ में इस विचार से मिलते हुए विचारों, संघर्षों, आंदोलनों से जुड़े लोगों को अपनी बात रखने के लिए बुलाया जाता है और उनके वक्तव्यों पर चर्चा होती है. लोकविद्या जन आन्दोलन की डा. चित्रा सहस्रबुद्धे ने 28 जनवरी 2018 को बंगलुरु में रागी कणा में दिए वक्तव्य का सार नीचे दिया गया है. वक्तव्य इस लिंक पर सुना जा सकता है—

https://drive.google.com/file/d/1t7ZdLVZ5vAF-ZI046JVEt9N0ngrds4gr/view?usp=drivesdk

कुछ वर्षों से हमारे देश में स्त्री-समाज में हो रही हलचल, संघर्ष और अभियानों पर नज़र डाली जाये तो जो महत्त्वपूर्ण धारायें उभरकर आती हैं उनमें एक है पिछले वर्ष पढ़े-लिखे या प्रोफ़ेशनल स्त्री-समाज से उठी धारा जिसमें पिंजरा तोड़ और  #MeToo जैसे अभियान हैं। दूसरी धारा पिछले दशक में किसान, कारीगर, आदिवासी, ठेला-पटरी के दुकानदार आदि समाजों की स्त्रियों के ज़मीन और रोजगार से बेदखली से पैदा हुए संघर्षों की है। इस दूसरी धारा में स्त्रियों की बहुत बड़ी संख्या रही और देश के हर कोने से यह आवाज़ उठी लेकिन इनके संघर्षों को महिला आन्दोलन में नहीं गिना जाता. क्यों?  इन दो धाराओं के बीच कुछ और भी धाराएं गिनी जा सकती हैं, जो स्त्रियों के असुरक्षित जीवन और उनके साथ हुई दुर्व्यवहार की बढती और डरावनी होती जा रही घटनाओं से सामने आई हैं। सवाल है कि इन हलचलों से स्त्रियां आगे के रास्ते कैसे गढ़ें? हमारे पास क्या संभावनाएं हैं? विचार और अनुभवों की हमारे पास कौन सी विरासत है? इन सवालों पर लोकविद्या विचार से जो समझ बनी है, उसे यहाँ साझा किया गया है।

पिछली सदी के अंतिम दशक में वाराणसी और आस-पास के जिलों में नारी विद्या संस्थान और नारी हस्तकला उद्योग समिति की ओर से महिलाओं के बीच संगठन का कार्य शुरू हुआ। उद्देश्य यह था कि स्त्रियों की दृष्टि से सार्वजनिकता के नये मायने और विचार बनें। क्योंकि हमारी समझ यह बनी कि आधुनिक शिक्षा, आधुनिक बाज़ार व उद्योग और राजनीति से पाले-पोसे गए आज के सार्वजनिक जीवन में सामान्य स्त्रियों के लिए कोई जगह नही है और यह उनके लिए उपेक्षा, उत्पीड़न, हर तरह की असुरक्षा और शोषण का कारण बना हुआ है तथा उन्हें निष्क्रिय बनाने का आधार बन गया है। 20वीं सदी के कुछ आंदोलनों की सीख हमें इस नतीजे तक ले गई कि पूरे स्त्री-समाज के लिए न्याय व सम्मानपूर्ण समाज बने इसका आधार सामान्य स्त्रियों की  सक्रियता में है. और ऐसी सक्रियता के रास्तों का  पुनर्निर्माण उनके अपने ज्ञान से ही संभव है .  स्त्री – ज्ञान और लोकविद्या-बाजार के विचारों में सामान्य स्त्रियों की सक्रियता की असीम संभावनाएं सामने आईं।

आधुनिक ज्ञान (साइंस) की सैद्धांतिक चौखट में सामान्य स्त्री में बसे ज्ञान भंडार को देखने और उसमें छिपी शक्ति को पहचानने की अवधारणाएं और तरीके नही हैं, जिनके अभाव में वे स्त्रियों के कार्यों को मात्र प्राकृतिक क्षमता, हुनर और पारंपरिक ज्ञान के रूप में ही देख पाते हैं। चूंकि प्रगति की अवधारणाएं केवल आधुनिक ज्ञान में ही मानी गई हैं इसलिए इससे अन्य ज्ञान के रूप पिछड़े, अतार्किक, अप्रासंगिक और अमान्य माने जाते हैं . इसी में स्त्री-समाज के उत्पीडन और शोषण के आधार हैं। इस हालत से निकलने के रास्तों की खोज में स्त्री-ज्ञान की अवधारणा को आकार मिला। स्त्री-ज्ञान की अवधारणा को सामान्य स्त्रियों की सामाजिक स्वायत्तता, सक्रियता और न्यायपूर्ण हैसियत को आकार देने वाली बुनियाद के रूप में देखा और तब स्त्री-दृष्टि से सार्वजनिकता गढ़ने के मार्ग खुलते नज़र आये। उद्योग, शिक्षा, पोषण, चिकित्सा व स्वास्थ्यरक्षा जैसे क्षेत्रों में सामान्य स्त्री के ज्ञान (लोकविद्या) के बल पर सार्वजनिकता गढ़ी जाये तो उसकी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सुरक्षा तो मज़बूत होती ही है, समाज में एक सम्मानपूर्ण स्थिति की पक्की बुनियाद बनती है.

आगे इस विचार के बल पर समाज की उन ज्ञानधाराओं (किसान, कारीगर, आदिवासी समाजों की ज्ञान धाराओं) को पहचान पाने में मदद मिली, जिन्हें आधुनिक ज्ञान के तहत ज्ञान ही नही माना गया। समाज में बहती ये असंगठित ज्ञान धाराएं मिलकर लोकविद्या कहलाती हैं। इन असंख्य ज्ञानधाराओं के बीच और सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में व्याप्त ऊँच-नीच खत्म हो इसके लिए आवश्यक है कि समाज के संगठन और संचालन में इन ज्ञानधाराओं (जिनमें स्त्री-ज्ञान धारा भी है ) की बराबरी से भागीदारी हो सके, ऐसी सार्वजनिकता का रास्ता बनाया जाए। लोकविद्या-बाजार का विचार और कार्यक्रम इसी आधार पर विकसित हुआ। इसमें आज से भिन्न एक ऐसी सार्वजनिकता को बनाने की संभावना दिखाई देती है जिसमें सहजता और प्रकृति के लय में जीने के ज्ञान को प्रतिष्ठा हो और समाज की उत्पादन व  वितरण की व्यवस्थाओं तथा संचालन की संस्थाओं में स्त्री-ज्ञान का पूर्णतः समावेश हो। लोकविद्या-बाजार अभियान और ज्ञान पंचायत के तहत उठाये गए कार्यक्रम और मुद्दों के मार्फत इन प्रयासों की चर्चा की गई है

चित्रा सहस्रबुद्धे , लोकविद्या जन आंदोलन, वाराणसी

लोकविद्या स्वराज दर्शन

लोकविद्या स्वराज भारतीय समाज को विद्या (हुनर अथवा ज्ञान ) के आधार पर संगठित करने का एक नया दर्शन (फलसफ़ा ) है। एक नयी राजनीतिक व्यवस्था (तंत्र) के निर्माण का फलसफ़ा है क्योंकि यह मज़हब , जाति और लिंग  जैसे खंभों के आधार पर हो रही समकालीन (और दशकों से चली आ रही) राजनीति और उसके मूल दर्शन को अस्वीकारता है और उससे जुडी विकास प्रक्रिया के मूल दर्शन को अस्वीकार करता है जो समाजों के  विस्थापन, जंगलों, जीवों और वनस्पतियों के विनाश का निर्धारण करता है। इस दर्शन का मूल आधार यह है कि लोगों के द्वारा हासिल की गयी विद्या जिसका उपयोग वह अपने समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करते हैं , मज़हब , जाति, या लिंग विशिष्ट नहीं है। समाज का एक उपयोगी सदस्य बनने के लिए हर व्यक्ति विद्या (हुनर/ज्ञान) हासिल  करना चाहता है, किसी मनपसंद पेशे से जुड़ना चाहता है  क्योंकि ऐसी उपलब्धि  उसे एक अद्वितीय पहचान दिलाती है। बहुमूल्य ज्ञान के विभिन्न रूपों के बीच किसी प्रकार की प्रतिकूलता नहीं होती , बल्कि एक अंतिम गंतव्य-सभ्य समाज की स्थापना के कार्य को निरंतर आगे बढ़ाने के लिए आपसी तालमेल का भाव रहता है।  ज्ञान का विकास समस्याओं के समाधान से जुड़ा है। जिस किसी व्यक्ति में इन समस्याओं को समझने और उनका हल निकालने की जिज्ञासा और क्षमता रहती है उसके भीतर विद्या विकसित होती है और ऐसा होना किसी भी मज़हब, जाति और लिंग के आधीन  नहीं।

मानसिक संकाय किसी भी मज़हब, जाति, नस्ल, रंग, भौगोलिक क्षेत्र अथवा लिंग के आधीन नही  है। इसलिए एक भौगोलिक क्षेत्र में विकसित हुई विद्या (इसके आधार और स्वरूप) को किसी विदेशी मानदण्ड के द्वारा परखने का कोई मूलाधार नहीं है। यदि समाज में विकसित ज्ञान (विद्या अथवा हुनर)  प्रासंगिक है, तो वह निर्विवाद ज्ञान है और किसी भी अन्य प्राधिकारी से कोई प्रमाण पत्र लेने की आवश्यकता नहीं है। समकालीन ज्ञान भावी पीढ़ी के लिए चाहे किताबों में दर्ज़ हो  या मौखिक रूप से बयाँ किया गया हो, विद्या की सत्यता तरीकों के आधीन नही है ।

एक सभ्य समाज में अपनी छोटी और लंबी अवधि की आवश्यकताओं की पूर्ति की दिशा में योगदान करने के लिए हर व्यक्ति को अवसर प्रदान होने चाहिए और ऐसा केवल तब संभव है जब उसे हुनरमंद बनने के अवसर प्राप्त हों। इस प्रकार के अवसर किसी मज़हब, जाति अथवा लिंग के मोहताज़ नही। यदि समाज के लिए उपयोगी ज्ञान प्राप्त करने के रास्ते उपलब्ध न हों तो  सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति में  योगदान से लोग वंचित रह जाते हैं और  संभवतः  ईमानदारी से रोजगार कमाने के साधनों से भी।

व्यक्ति का जन्म से किसी मज़हब , जाति  अथवा  लिंग  से जुड़ना महज़ एक इत्तफ़ाक है  जबकि किसी विशेष विद्या, हुनर अथवा ज्ञान की ओर  निष्ठा एक व्यक्तिगत रुचि/ प्रवृति का प्रमाण  है –सामाजिक और मज़हबी  वर्गीकरण के बावजूद भी। इसलिए मज़हब  और जाति के  स्वयं घोषित संरक्षकों द्वारा किये गये और किये जा रहे अत्याचारों और पुरुषों की महिलाओं से स्वयं घोषित श्रेष्ठता से प्रेरित नारी शोषण को केवल  ज्ञान आधारित पहचान पर संगठित समाज में रोका जा सकता है। ज्ञान का निरंतर विकास  समाज  को  लगातार धीरे धीरे लेकिन निश्चित रूप से  निम्न से उच्च स्तर  की जागरूकता की स्थिति  में परिवर्तित करता  है। समाज में लोकहित के लिए निरंतर बदलाव केवल ज्ञान के बल पर ही संभव है, क्योंकि  यह किसी मज़हब , जाति अथवा लिंग को नही पहचानता।

लोकविद्या स्वराज का मूलाधार ज्ञान और लोगों में इसे हासिल करने की और इसके बल पर समस्याओं का समाधान करने की क्षमता है। लोकविद्या स्वराज की स्थापना समकालीन राजनीतिक निज़ाम के रहते संभव नहीं है। लोकविद्या जन आन्दोलन हैदराबाद ने ‘लोकविद्या स्वराज’ के नाम से एक पुस्तिका प्रकाशित की है जिसमें एक नये राजनीतिक तंत्र के निर्माण की बात पेश की गयी है, जिससे दलों की राजनीति  लोक – राजनीति में परिवर्तित  हो जाएगी। इस पुस्तिका का लिंक है —

Hindi  <http://www.vidyaashram.org/papers/LokavidyaSwarajyamHindiBook.pdf>

English  <http://www.vidyaashram.org/papers/LokavidyaSwarajyamEnglishBook.pdf>

— ललित कौल

21 वीं सदी का दार्शनिक रुझान

आज का सन्दर्भ 

देश और दुनिया का जो गरीब, शोषित और तिरस्कृत समाज है वही लोकविद्या समाज है. इनमें अधिकांश किसान, कारीगर, तरह-तरह की सेवाओं और मरम्मत वाले, आदिवासी और ठेला-पटरीवाले समाजों के परिवार शामिल हैं. ये सब विश्वविद्यालय नहीं गए हैं तथा अपने ज्ञान के बल पर अपने परिवार चलाते हैं और समाज की सेवा करते हैं. इन्हीं लोगों के ज्ञान को लोकविद्या कहते है. इसीलिए ये सब मिलकर एक लोकविद्या समाज बनाते हैं. ध्यान रहे इनकी यह पहचान इनकी किसी कमजोरी अथवा शोषित तिरस्कृत परिस्थिति के आधार पर न होकर इनकी अपनी ताकत के आधार पर की गई है. आधुनिक समाज में शुरू से ही इनका उद्धार यह समाज के नेतृत्व और दर्शन के सामने का शायद सबसे बड़ा सवाल रहा है. इन्हें लोकविद्या-समाज के रूप में पहचानना सामाजिक परिवर्तन की उस प्रक्रिया का अंग है जो पूँजी और ऊँच-नीच पर आधारित समाज को बदलकर ज्ञान और बराबरी पर आधारित समाज के निर्माण की प्रक्रिया है.

लोकविद्या-समाज के उद्धार के रास्ते का एक बड़ा पड़ाव यह है कि लोकविद्या और विश्वविद्यालय की विद्या में बराबरी और मैत्री का रिश्ता बने. आज जिस नज़र से विश्वविद्यालय लोकविद्या को देखते हैं, उसी नज़र से सरकारें लोकविद्या-समाज को देखती हैं. यह तिरस्कार की नज़र है. लोकविद्या-समाज को अपने ज्ञान के दर्शन व अपने समाजों  की ताकत के बल पर यह स्थिति बदलनी है. यही सन्दर्भ है परिवर्तन के नए दर्शन का.

तमाम कारीगर, किसान और आदिवासी नेताओं की बात उनके समाज वाले सुनते हैं, लेकिन न सरकारें उनकी बात सुनती हैं, न आधुनिक शिक्षा के कोई संस्थान. ये समाज अपनी पंचायतों के जरिए अपनी समस्याओं का हल भी ढूढते हैं, लेकिन कोई भी सरकारी प्रतिष्ठान अपनी नीतियां अथवा कार्य तय करते वक्त इनसे सलाह मशविरा नहीं करते. उचित तो यही जान पड़ता है कि समाज की समस्याओं का हल समाज खुद करे. और इसके लिए आवश्यक यह है कि लोगों के ज्ञान को किसी भी प्रतिष्ठित ज्ञान के बराबर का दर्जा मिले और लोगों के हाथों में आवश्यक संसाधन हों. शायद कोई भी ऐसी सामाजिक समस्या नहीं है जिसके हल के लिए विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों की ज़रूरत हो, या अनाप-शनाप रुपयों की ज़रूरत हो.

दुनिया में उदय हो रहे परिवर्तन के नए विचार

20 वीं सदी के अंतिम दशक के शुरू में दुनियाभर की सरकारों ने मिलकर एक विश्व व्यापार संगठन बनाया और सभी देशों ने निजीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण की नीतियां अपनाईं. इन नीतियों के चलते लोकविद्या-समाज नए ढंग से उत्पीडन और शोषण का शिकार होता चला गया. किसान, आदिवासी, कारीगर, छोटे-छोटे दूकानदार और महिलाएं और सभी तरह के समाज सेवक एक ऐसे बाज़ार में फेक दिए गए जो उन्हें सिर्फ लूटता है. उस वक्त के प्रचलित परिवर्तन के दर्शन इन स्थितियों से मुकाबला करने में असफल रहे. सत्ता और पैसे के सामने आम जनता असहाय होती चली गई. लोकविद्या-समाज के लोगों ने अपने विस्थापन और शोषण के खिलाफ न जाने कितने संघर्ष किये, लेकिन उस समय के परिवर्तन के कार्यकर्त्ता ऐसा कोई दर्शन सामने नहीं ला सके जिससे समाजों के मन में कोई उम्मीद जगती और उनके संघर्षों में कोई व्यापक एकता बन पाती. परंतु 21 वीं सदी के शुरू से वैश्वीकरण के विरोध में विश्व सामाजिक मंच ने वैश्विक स्तर पर एक बड़ा और खुला मंच तैयार किया तथा कुछ ही वर्षों में कई देशों में वहां की संस्कृति और ज़रूरतों के अनुरूप परिवर्तन के नए दर्शन सामने आये. नए-नए विचार सामने आये हैं जो हम सबके लिए जानने लायक हैं.

  • दक्षिणी अमेरिका में बोलीविया और इक्वाडोर नाम के देशों के आदिवासी बहुल समाजों ने ‘धरती माँ’ के दर्शन को अपने राष्ट्रों के पुनर्निर्माण का आधार बनाया. इस आधार पर इन्होंने अपने नए संविधान बनाए हैं और नए ढंग से साम्राज्यवाद का विरोध करते हैं. प्रकृति और धरती के अधिकारों की यह बात पंचतत्वों के दर्शन से मिलती-जुलती है.
  • वाया कम्पेसिना नाम से एक किसानों और कृषि मज़दूरों का अंतर्राष्ट्रीय संगठन और आन्दोलन है. इसने ‘ खाद्य संप्रभुता’ का नया विचार दिया है. खाद्य सुरक्षा के नाम पर दुनिया भर की सरकारें खाद्य के क्षेत्र में पूंजीवादी ठेकेदारों के हाथ गरीब लोगों का भोजन सौंप रही हैं. जबकि भोजन कैसे पूरा हो इसकी नीति और कार्य की पूरी ज़िम्मेदारी ग्रामीण समाज के हाथ होनी चाहिए और इसके लिए स्थानीय संसाधनों पर उनका स्वामित्व होना चाहिए. यही खाद्य संप्रभुता का विचार है.
  • भारत के किसान आन्दोलन और जल-जंगल-ज़मीन के जनांदोलन लोकविद्या-समाज की स्वतंत्र पहचान बनाने और देश के भविष्य का एक स्वदेशी दृष्टिकोण बनाने की भूमि तैयार करते रहे हैं. लोकविद्या का दर्शन और लोकविद्या जन आन्दोलन इसी भूमि की उपज हैं. 2011 का भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन          ‘ स्वराज ’ के विचार को फिर से सार्वजनिक बहस में ले आया है.
  • यूरोप, अमेरिका और कनाडा के कालेज के विद्यार्थी शिक्षा के क्षेत्र पर बहुराष्ट्रीय निगमों के कब्ज़े के विरोध में आन्दोलन करते रहे हैं. वे ज्ञान को विश्वविद्यालय से मुक्त देखना चाहते हैं. वे मरे हुए बनाम जीवंत ज्ञान की बात करते हैं. उनका कहना है कि विश्वविद्यालय में ‘मरा हुआ ज्ञान’ पढाया जाता है और यह कि वे ‘जीवंत ज्ञान’ के पैरोकार हैं.
  • ‘अरब वसंत’ के नाम से कई अरब देशों में वहां की सत्ता के खिलाफ संघर्ष हुए और अन्यथा जकड़न से भरे समाजों में आशा की नई किरणों का संचार हुआ.

इन आंदोलनों को ज्ञान आंदोलनों के रूप में भी देखा जा सकता है जिनके नेतृत्व ने अपने समाज की क्रियाओं और विरासत से नेतृत्वकारी विचारों का निर्माण किया. यह समकालीन दुनिया में ऐसे ज्ञान के रूप में सामने आता है जिसका आधार स्वदेशी दर्शन में हो, न कि उच्च शिक्षा संस्थानों के मार्फ़त प्रचलित यूरोपीय दर्शन और इतिहास में. यह दार्शनिक रुझान यह दावा भी करता है कि वर्तमान समाजों के आज के ज्ञान और उनकी ज्ञान की विरासत में अपने समाजों का सञ्चालन अपने हाथ लेने का आधार है.

— सुनील सहस्रबुद्धे

बड़े सब सोच गए हैं !

हम जब समाज के बारे में कुछ सोचने-समझने लगे थे उन दिनों की बात है। हमारे घर एक पंडितजी आये। अपने समाज में वे विद्वान माने जाते थे। उन्हें वेद, पुराण और नीतिशास्त्र की गहरी जानकारी थी। सभी लोग उनका सम्मान करते थे। जैसा की अक्सर भेट मुलाकातों में लोग वर्तमान व्यवस्थाओं पर बातचीत करते हैं, इनके प्रति असंतोष जताते हैं या आलोचना करते हैं वैसी ही उनसे भी चर्चा होने लगी। हमारे चाचा कहने लगे कि नया सोचना सीखना होगा तभी समाज की गड़बड़ियां दूर की जा सकेंगी। इस पर बात होने लगी तो पंडितजी गंभीरता से बोले कि नया क्या सोचना है सब तो वेदों में लिखा ही है , केवल उसे जीवन में कैसे उतारें, बस्स यही काम करना है।
पंडितजी के जाने के बाद हम आपस में कई दिनों तक मज़ाक किया करते कि सब कुछ तो जाना-समझा है बस, करना ही बाक़ी है!

आगे कुछ वर्षों में सामाजिक – राजनीतिक हलचलों में भाग लेने के अवसर मिले और कई तरह के लोगों और विचारधाराओं से सामना हुआ। लेकिन पंडितजी हर बार सामने आ जाते, रूप बदल कर !

एक गंभीर व अत्यंत विनम्र गांधीवादी बुज़ुर्ग मिले जिनकी राय थी कि गांधीजी ने ग्रामस्वराज का विचार दिया है, बस उस पर काम करने की ज़रूरत है, सारी समस्याओं का हल निकल जायेगा। दलित संगठन के एक व्यक्ति ने बाबासाहेब के विचारों में मानवता के  पूर्ण कल्याण का दावा किया। एक मार्क्सवादी क्रांतिकारी विचारों के समझदार समझे जाने वाले कार्यकर्ता का यह कहना था कि विचार तो है ही, संगठन के लिए निकलना है, बस।
लेकिन समय बदल चुका है। नवीनीकरण और नवनिर्माण की क्रियाओं के बारे में भी तो सोचना होगा।
आज की राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था कुछ ही लोगों को ऐशोआराम और सुविधाएं जुटाती है और ऐसा करने में सामान्य लोगों के जीवन को तहस-नहस कर दे रही हैं। हमारी चुनी हुई सरकारें  ही हमारे खिलाफ़ कार्य करती हैं। ये व्यवस्थाएं अन्यायी हैं। क्योंकि इनके तहत किसान, कारीगर, मज़दूर, दुकानदार , आदिवासी, महिलाएं सभी  का जीवन बदहाली और अनिश्चितता के अंधेरो में तेजी से धकेला जा रहा है। दिल्ली की केंद्रीय सरकार और सभी राजनैतिक दल इस व्यवस्था के लिए ज़िम्मेदार हैं।

क्या मूल ग्रंथों के विचार और महापुरुषों के कार्यों को दोहराने से  लोकोन्मुख बदलाव आ सकेगा? क्या सामान्य लोगों के जीवन को खुशहाल और न्यायपूर्ण बनाने का आज का विचार लोगों की सोच और ज्ञान (लोकविद्या) से निर्लिप्त होकर आएगा? लोगों की पहल उनके अपने ज्ञान में नही होगी तो क्या बदलाव लोकोन्मुख होगा ?

अब काफी बुज़ुर्ग हो चले चाचाजी से वार्ता के दौरान यह निकल कर आया कि महापुरुषों या मूल ग्रंथों से उजाला ज़रूर मिलता हैं लेकिन रास्ता तो सामान्य जीवन के बीच से ही बनाना होता है। जो बना ले जाये वही न्याय की स्थापना का नेतृत्व कर पाता है। फिर विचार और कार्य कभी अलग नही किये जाते, करेंगे तो नतीजे ही नही निकलेंगे और यदि निकलें भी तो लोकहित में नही जा पाएंगे। और विचार कहाँ से आएंगे? लोगों के सामान्य जीवन से ही। यहीं पर विचार, कार्य और दर्शन का फलदायी संगम होता है।

चित्रा सहस्रबुद्धे

 

दर्शन अखाड़ा क्या है ?

  • दर्शन अखाड़ा दर्शन की धाराओं में संवाद और भाईचारा बनाने और रचना के नए रास्ते खोजने का स्थान है. दर्शन की अलग-अलग धाराओं का दर्शन अखाड़े में स्वागत है.
  • दर्शन अखाड़ा वह स्थान है जहाँ से समाज के नेतृत्व और सामान्य लोगों के बीच दार्शनिक संवाद की संभावना, वास्तविकता और आवश्यकता को रेखांकित किया जायेगा. 
  • दर्शन अखाड़ा में हर सामाजिक हलचल के दार्शनिक पक्ष पर चर्चा की जाएगी.
  • दर्शन अखाड़ा समाज, कला, ज्ञान, भाषा, राजनीति, धर्म, शिक्षा, अर्थ, जीवनशैली इत्यादि क्षेत्रों से सम्बंधित दर्शन-वार्ता का स्थान है .
  • ‘दर्शन’ का अर्थ अधिकांश भारतीय भाषाओं के लोग समझते हैं. हो सकता है कि कुछ भाषाओं में समानार्थी शब्दों पर जाना पड़े. दर्शन आध्यात्मिक और व्यावहारिक दोनों एक साथ होता है. वह वैयक्तिक और सामाजिक दोनों एक साथ होता है. विचार दार्शनिक तभी होता है जब वह सीमाओं में नहीं बंधता. दर्शन को किसी शैक्षणिक योग्यता, विशेषज्ञता अथवा समाज में विशेष स्थान की आवश्यकता नही होती. दर्शन अखाडा सहज बुद्धि से दुनिया को देखने का प्रयास है. यह देखने का प्रयास है कि दुनिया को बेहतर बनाने के लिए आज मनुष्य और समाज की शक्ति के स्रोत क्या हैं और कहाँ हैं ?
  • सहज बुद्धि और शक्ति के स्रोत दोनों उतने ही परिवर्तनशील होते हैं जितना परिवर्तनशील सामान्य समाज व जीवन होता है. इसलिए हम आशा करते हैं कि यहाँ दर्शन के वे रूप सामने आयेंगे जिन्हें किन्हीं पूर्व मान्यताओं के अंतर्गत समझना अथवा स्थापित करना एक असहज कार्य होगा.

दर्शनवार्ता क्यों ?

ऐसा कहा जाता है कि आज तकनीकी और विशेषज्ञता का दौर है. ऐसा कहने वाले व्यापक मानव हित तथा दर्शन इत्यादि पर चर्चा को गैरज़रूरी समझते हैं . तथापि वास्तविकता यह है कि सभी कार्यों में कोई न कोई दर्शन निहित होता है और मानव जीवन पर होने वाले दूरगामी नतीजे भी निहित होते हैं . व्यापक बहस और दर्शन से किनारा कसना आत्मघाती है. प्रकृति के विनाश और मनुष्य और मनुष्य के बीच भयानक अंतर ये सब ऐसे ही नतीजे हैं . दूसरे महायुद्ध के बाद, यानि 20 वीं सदी के उत्तरार्ध में, दुनिया की पुनर्रचना में दर्शन को उचित स्थान नहीं दिया गया, न पश्चिम में और न नवोदित राष्ट्रों में. यह एक बड़ा कारण है कि आज दुनिया गरीबी, गैर-बराबरी, भयानक युद्धों और जलवायु संकट से घिरी हुई है .

20 वीं सदी के पूर्वार्ध में साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद से संघर्ष के दौरान वैश्विक दक्षिण के अनेक देशों में दर्शन पर व्यापक चर्चाएं हुईं हैं . इनमें से बहुत सी अपनी स्वदेशी परम्पराओं की समकालीन पुनर्रचना के रूप में सामने आईं. 1939 से 1945 के बीच यूरोप से शुरू हुए महायुद्ध के बाद तमाम उपनिवेश स्वतंत्र हुए तथा साम्राज्यवाद को पीछे हटना पड़ा और अनेक देशों में आज़ाद सरकारें बनी. किन्तु इन देशों में पश्चिम जैसी राज्य प्रणाली तथा विश्वविद्यालयों में पश्चिमी सोच के दबदबे के चलते स्वदेशी दार्शनिक परम्पराओं का स्थान समाज में गौण हो गया. इससे समाज की प्रमुख धारा और सामान्य लोगों के बीच का दार्शनिक संवाद टूटता चला गया. यह एक भीषण परिस्थिति है जिसमें समाज के उत्थान और पुनर्रचना के लोकप्रिय मूल्यों का निर्माण रुक जाता है और समाज एक अवनत अवस्था में किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है. ऐसा नहीं है कि इस दौर में हुई वार्ताओं का स्वदेशी के विचार के साथ कुछ लेना-देना नहीं है . जन आंदोलनों के अंतर्गत तथा लोकहित के मुद्दों पर संघर्षों के सन्दर्भ में बुनियादी सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक चर्चाएं हुईं, किन्तु ये चर्चाएं स्वदेशी दार्शनिक परम्पराओं से न जुड़ सकीं.

20 वीं सदी के अंत में वैश्विक स्तर पर बड़े आर्थिक, राजनैतिक और तकनीकी (इन्टरनेट) परिवर्तनों के साथ एक नए युग की शुरुआत हुई है जिसे हम संवाद का युग कह सकते हैं . इस दौर में जहाँ एक तरफ पश्चिम में उपजी और दुनियाभर में फैली कई दर्शन धाराओं की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े होने लगे, वहीँ दर्शन की स्वदेशी धाराओं से प्रेरणा लेने के मौके पैदा हुए हैं, हालाँकि सामान्य लोगों के साथ दार्शनिक संवाद टूटने का संकट बहुत बड़ा है. इसके चलते विचारों के पुनर्निर्माण और दर्शन के पुनरोदय के स्रोत सूखे नज़र आते हैं . ऐसे समय में दर्शन पर खुल कर बहस की आवश्यकता होती है. यह आवश्यक होता है कि दर्शन समाज में एक शक्ति के रूप में उभरे. इन्हीं सन्दर्भों में दर्शन अखाड़ा अपनी भूमिका देखता है.

दर्शन की यह चर्चा सुगम रहे इसके लिए कुछ विषयवार प्रस्तुति अथवा लेखन की व्यवस्था यहाँ की गई है . कला, भाषा, ज्ञान, सामान्य जीवन, स्वराज आदि ये विषय हैं . दर्शन की चर्चा वैसे तो अविभाज्य है और इन विषयों के अंतर्गत बात करते हुए भी हम विषयों में बंध जायें यह ज़रूरी नहीं है.