21 वीं सदी का दार्शनिक रुझान

आज का सन्दर्भ 

देश और दुनिया का जो गरीब, शोषित और तिरस्कृत समाज है वही लोकविद्या समाज है. इनमें अधिकांश किसान, कारीगर, तरह-तरह की सेवाओं और मरम्मत वाले, आदिवासी और ठेला-पटरीवाले समाजों के परिवार शामिल हैं. ये सब विश्वविद्यालय नहीं गए हैं तथा अपने ज्ञान के बल पर अपने परिवार चलाते हैं और समाज की सेवा करते हैं. इन्हीं लोगों के ज्ञान को लोकविद्या कहते है. इसीलिए ये सब मिलकर एक लोकविद्या समाज बनाते हैं. ध्यान रहे इनकी यह पहचान इनकी किसी कमजोरी अथवा शोषित तिरस्कृत परिस्थिति के आधार पर न होकर इनकी अपनी ताकत के आधार पर की गई है. आधुनिक समाज में शुरू से ही इनका उद्धार यह समाज के नेतृत्व और दर्शन के सामने का शायद सबसे बड़ा सवाल रहा है. इन्हें लोकविद्या-समाज के रूप में पहचानना सामाजिक परिवर्तन की उस प्रक्रिया का अंग है जो पूँजी और ऊँच-नीच पर आधारित समाज को बदलकर ज्ञान और बराबरी पर आधारित समाज के निर्माण की प्रक्रिया है.

लोकविद्या-समाज के उद्धार के रास्ते का एक बड़ा पड़ाव यह है कि लोकविद्या और विश्वविद्यालय की विद्या में बराबरी और मैत्री का रिश्ता बने. आज जिस नज़र से विश्वविद्यालय लोकविद्या को देखते हैं, उसी नज़र से सरकारें लोकविद्या-समाज को देखती हैं. यह तिरस्कार की नज़र है. लोकविद्या-समाज को अपने ज्ञान के दर्शन व अपने समाजों  की ताकत के बल पर यह स्थिति बदलनी है. यही सन्दर्भ है परिवर्तन के नए दर्शन का.

तमाम कारीगर, किसान और आदिवासी नेताओं की बात उनके समाज वाले सुनते हैं, लेकिन न सरकारें उनकी बात सुनती हैं, न आधुनिक शिक्षा के कोई संस्थान. ये समाज अपनी पंचायतों के जरिए अपनी समस्याओं का हल भी ढूढते हैं, लेकिन कोई भी सरकारी प्रतिष्ठान अपनी नीतियां अथवा कार्य तय करते वक्त इनसे सलाह मशविरा नहीं करते. उचित तो यही जान पड़ता है कि समाज की समस्याओं का हल समाज खुद करे. और इसके लिए आवश्यक यह है कि लोगों के ज्ञान को किसी भी प्रतिष्ठित ज्ञान के बराबर का दर्जा मिले और लोगों के हाथों में आवश्यक संसाधन हों. शायद कोई भी ऐसी सामाजिक समस्या नहीं है जिसके हल के लिए विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों की ज़रूरत हो, या अनाप-शनाप रुपयों की ज़रूरत हो.

दुनिया में उदय हो रहे परिवर्तन के नए विचार

20 वीं सदी के अंतिम दशक के शुरू में दुनियाभर की सरकारों ने मिलकर एक विश्व व्यापार संगठन बनाया और सभी देशों ने निजीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण की नीतियां अपनाईं. इन नीतियों के चलते लोकविद्या-समाज नए ढंग से उत्पीडन और शोषण का शिकार होता चला गया. किसान, आदिवासी, कारीगर, छोटे-छोटे दूकानदार और महिलाएं और सभी तरह के समाज सेवक एक ऐसे बाज़ार में फेक दिए गए जो उन्हें सिर्फ लूटता है. उस वक्त के प्रचलित परिवर्तन के दर्शन इन स्थितियों से मुकाबला करने में असफल रहे. सत्ता और पैसे के सामने आम जनता असहाय होती चली गई. लोकविद्या-समाज के लोगों ने अपने विस्थापन और शोषण के खिलाफ न जाने कितने संघर्ष किये, लेकिन उस समय के परिवर्तन के कार्यकर्त्ता ऐसा कोई दर्शन सामने नहीं ला सके जिससे समाजों के मन में कोई उम्मीद जगती और उनके संघर्षों में कोई व्यापक एकता बन पाती. परंतु 21 वीं सदी के शुरू से वैश्वीकरण के विरोध में विश्व सामाजिक मंच ने वैश्विक स्तर पर एक बड़ा और खुला मंच तैयार किया तथा कुछ ही वर्षों में कई देशों में वहां की संस्कृति और ज़रूरतों के अनुरूप परिवर्तन के नए दर्शन सामने आये. नए-नए विचार सामने आये हैं जो हम सबके लिए जानने लायक हैं.

  • दक्षिणी अमेरिका में बोलीविया और इक्वाडोर नाम के देशों के आदिवासी बहुल समाजों ने ‘धरती माँ’ के दर्शन को अपने राष्ट्रों के पुनर्निर्माण का आधार बनाया. इस आधार पर इन्होंने अपने नए संविधान बनाए हैं और नए ढंग से साम्राज्यवाद का विरोध करते हैं. प्रकृति और धरती के अधिकारों की यह बात पंचतत्वों के दर्शन से मिलती-जुलती है.
  • वाया कम्पेसिना नाम से एक किसानों और कृषि मज़दूरों का अंतर्राष्ट्रीय संगठन और आन्दोलन है. इसने ‘ खाद्य संप्रभुता’ का नया विचार दिया है. खाद्य सुरक्षा के नाम पर दुनिया भर की सरकारें खाद्य के क्षेत्र में पूंजीवादी ठेकेदारों के हाथ गरीब लोगों का भोजन सौंप रही हैं. जबकि भोजन कैसे पूरा हो इसकी नीति और कार्य की पूरी ज़िम्मेदारी ग्रामीण समाज के हाथ होनी चाहिए और इसके लिए स्थानीय संसाधनों पर उनका स्वामित्व होना चाहिए. यही खाद्य संप्रभुता का विचार है.
  • भारत के किसान आन्दोलन और जल-जंगल-ज़मीन के जनांदोलन लोकविद्या-समाज की स्वतंत्र पहचान बनाने और देश के भविष्य का एक स्वदेशी दृष्टिकोण बनाने की भूमि तैयार करते रहे हैं. लोकविद्या का दर्शन और लोकविद्या जन आन्दोलन इसी भूमि की उपज हैं. 2011 का भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन          ‘ स्वराज ’ के विचार को फिर से सार्वजनिक बहस में ले आया है.
  • यूरोप, अमेरिका और कनाडा के कालेज के विद्यार्थी शिक्षा के क्षेत्र पर बहुराष्ट्रीय निगमों के कब्ज़े के विरोध में आन्दोलन करते रहे हैं. वे ज्ञान को विश्वविद्यालय से मुक्त देखना चाहते हैं. वे मरे हुए बनाम जीवंत ज्ञान की बात करते हैं. उनका कहना है कि विश्वविद्यालय में ‘मरा हुआ ज्ञान’ पढाया जाता है और यह कि वे ‘जीवंत ज्ञान’ के पैरोकार हैं.
  • ‘अरब वसंत’ के नाम से कई अरब देशों में वहां की सत्ता के खिलाफ संघर्ष हुए और अन्यथा जकड़न से भरे समाजों में आशा की नई किरणों का संचार हुआ.

इन आंदोलनों को ज्ञान आंदोलनों के रूप में भी देखा जा सकता है जिनके नेतृत्व ने अपने समाज की क्रियाओं और विरासत से नेतृत्वकारी विचारों का निर्माण किया. यह समकालीन दुनिया में ऐसे ज्ञान के रूप में सामने आता है जिसका आधार स्वदेशी दर्शन में हो, न कि उच्च शिक्षा संस्थानों के मार्फ़त प्रचलित यूरोपीय दर्शन और इतिहास में. यह दार्शनिक रुझान यह दावा भी करता है कि वर्तमान समाजों के आज के ज्ञान और उनकी ज्ञान की विरासत में अपने समाजों का सञ्चालन अपने हाथ लेने का आधार है.

— सुनील सहस्रबुद्धे

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