लोकविद्या स्वराज दर्शन

लोकविद्या स्वराज भारतीय समाज को विद्या (हुनर अथवा ज्ञान ) के आधार पर संगठित करने का एक नया दर्शन (फलसफ़ा ) है। एक नयी राजनीतिक व्यवस्था (तंत्र) के निर्माण का फलसफ़ा है क्योंकि यह मज़हब , जाति और लिंग  जैसे खंभों के आधार पर हो रही समकालीन (और दशकों से चली आ रही) राजनीति और उसके मूल दर्शन को अस्वीकारता है और उससे जुडी विकास प्रक्रिया के मूल दर्शन को अस्वीकार करता है जो समाजों के  विस्थापन, जंगलों, जीवों और वनस्पतियों के विनाश का निर्धारण करता है। इस दर्शन का मूल आधार यह है कि लोगों के द्वारा हासिल की गयी विद्या जिसका उपयोग वह अपने समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करते हैं , मज़हब , जाति, या लिंग विशिष्ट नहीं है। समाज का एक उपयोगी सदस्य बनने के लिए हर व्यक्ति विद्या (हुनर/ज्ञान) हासिल  करना चाहता है, किसी मनपसंद पेशे से जुड़ना चाहता है  क्योंकि ऐसी उपलब्धि  उसे एक अद्वितीय पहचान दिलाती है। बहुमूल्य ज्ञान के विभिन्न रूपों के बीच किसी प्रकार की प्रतिकूलता नहीं होती , बल्कि एक अंतिम गंतव्य-सभ्य समाज की स्थापना के कार्य को निरंतर आगे बढ़ाने के लिए आपसी तालमेल का भाव रहता है।  ज्ञान का विकास समस्याओं के समाधान से जुड़ा है। जिस किसी व्यक्ति में इन समस्याओं को समझने और उनका हल निकालने की जिज्ञासा और क्षमता रहती है उसके भीतर विद्या विकसित होती है और ऐसा होना किसी भी मज़हब, जाति और लिंग के आधीन  नहीं।

मानसिक संकाय किसी भी मज़हब, जाति, नस्ल, रंग, भौगोलिक क्षेत्र अथवा लिंग के आधीन नही  है। इसलिए एक भौगोलिक क्षेत्र में विकसित हुई विद्या (इसके आधार और स्वरूप) को किसी विदेशी मानदण्ड के द्वारा परखने का कोई मूलाधार नहीं है। यदि समाज में विकसित ज्ञान (विद्या अथवा हुनर)  प्रासंगिक है, तो वह निर्विवाद ज्ञान है और किसी भी अन्य प्राधिकारी से कोई प्रमाण पत्र लेने की आवश्यकता नहीं है। समकालीन ज्ञान भावी पीढ़ी के लिए चाहे किताबों में दर्ज़ हो  या मौखिक रूप से बयाँ किया गया हो, विद्या की सत्यता तरीकों के आधीन नही है ।

एक सभ्य समाज में अपनी छोटी और लंबी अवधि की आवश्यकताओं की पूर्ति की दिशा में योगदान करने के लिए हर व्यक्ति को अवसर प्रदान होने चाहिए और ऐसा केवल तब संभव है जब उसे हुनरमंद बनने के अवसर प्राप्त हों। इस प्रकार के अवसर किसी मज़हब, जाति अथवा लिंग के मोहताज़ नही। यदि समाज के लिए उपयोगी ज्ञान प्राप्त करने के रास्ते उपलब्ध न हों तो  सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति में  योगदान से लोग वंचित रह जाते हैं और  संभवतः  ईमानदारी से रोजगार कमाने के साधनों से भी।

व्यक्ति का जन्म से किसी मज़हब , जाति  अथवा  लिंग  से जुड़ना महज़ एक इत्तफ़ाक है  जबकि किसी विशेष विद्या, हुनर अथवा ज्ञान की ओर  निष्ठा एक व्यक्तिगत रुचि/ प्रवृति का प्रमाण  है –सामाजिक और मज़हबी  वर्गीकरण के बावजूद भी। इसलिए मज़हब  और जाति के  स्वयं घोषित संरक्षकों द्वारा किये गये और किये जा रहे अत्याचारों और पुरुषों की महिलाओं से स्वयं घोषित श्रेष्ठता से प्रेरित नारी शोषण को केवल  ज्ञान आधारित पहचान पर संगठित समाज में रोका जा सकता है। ज्ञान का निरंतर विकास  समाज  को  लगातार धीरे धीरे लेकिन निश्चित रूप से  निम्न से उच्च स्तर  की जागरूकता की स्थिति  में परिवर्तित करता  है। समाज में लोकहित के लिए निरंतर बदलाव केवल ज्ञान के बल पर ही संभव है, क्योंकि  यह किसी मज़हब , जाति अथवा लिंग को नही पहचानता।

लोकविद्या स्वराज का मूलाधार ज्ञान और लोगों में इसे हासिल करने की और इसके बल पर समस्याओं का समाधान करने की क्षमता है। लोकविद्या स्वराज की स्थापना समकालीन राजनीतिक निज़ाम के रहते संभव नहीं है। लोकविद्या जन आन्दोलन हैदराबाद ने ‘लोकविद्या स्वराज’ के नाम से एक पुस्तिका प्रकाशित की है जिसमें एक नये राजनीतिक तंत्र के निर्माण की बात पेश की गयी है, जिससे दलों की राजनीति  लोक – राजनीति में परिवर्तित  हो जाएगी। इस पुस्तिका का लिंक है —

Hindi  <http://www.vidyaashram.org/papers/LokavidyaSwarajyamHindiBook.pdf>

English  <http://www.vidyaashram.org/papers/LokavidyaSwarajyamEnglishBook.pdf>

— ललित कौल

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