सामान्य स्त्री के लिए नई सार्वजनिकता का निर्माण

कर्णाटक में हाथ से बने उत्पादों के पक्ष में प्रसन्ना जी के नेतृत्व में ग्राम सेवा संघ एक आन्दोलन चला रहा है. इस आन्दोलन के तहत बंगलुरु स्थित रागी कणा में प्रत्येक रविवार को हाथ से निर्मित उत्पादों का बाज़ार लगता है. इस बाज़ार में वस्त्र, खाद्य, सब्जी, फल, अनाज, हस्तशिल्प आदि तरह-तरह के सामान मिलते हैं और इस बाज़ार के साथ में इस विचार से मिलते हुए विचारों, संघर्षों, आंदोलनों से जुड़े लोगों को अपनी बात रखने के लिए बुलाया जाता है और उनके वक्तव्यों पर चर्चा होती है. लोकविद्या जन आन्दोलन की डा. चित्रा सहस्रबुद्धे ने 28 जनवरी 2018 को बंगलुरु में रागी कणा में दिए वक्तव्य का सार नीचे दिया गया है. वक्तव्य इस लिंक पर सुना जा सकता है—

https://drive.google.com/file/d/1t7ZdLVZ5vAF-ZI046JVEt9N0ngrds4gr/view?usp=drivesdk

कुछ वर्षों से हमारे देश में स्त्री-समाज में हो रही हलचल, संघर्ष और अभियानों पर नज़र डाली जाये तो जो महत्त्वपूर्ण धारायें उभरकर आती हैं उनमें एक है पिछले वर्ष पढ़े-लिखे या प्रोफ़ेशनल स्त्री-समाज से उठी धारा जिसमें पिंजरा तोड़ और  #MeToo जैसे अभियान हैं। दूसरी धारा पिछले दशक में किसान, कारीगर, आदिवासी, ठेला-पटरी के दुकानदार आदि समाजों की स्त्रियों के ज़मीन और रोजगार से बेदखली से पैदा हुए संघर्षों की है। इस दूसरी धारा में स्त्रियों की बहुत बड़ी संख्या रही और देश के हर कोने से यह आवाज़ उठी लेकिन इनके संघर्षों को महिला आन्दोलन में नहीं गिना जाता. क्यों?  इन दो धाराओं के बीच कुछ और भी धाराएं गिनी जा सकती हैं, जो स्त्रियों के असुरक्षित जीवन और उनके साथ हुई दुर्व्यवहार की बढती और डरावनी होती जा रही घटनाओं से सामने आई हैं। सवाल है कि इन हलचलों से स्त्रियां आगे के रास्ते कैसे गढ़ें? हमारे पास क्या संभावनाएं हैं? विचार और अनुभवों की हमारे पास कौन सी विरासत है? इन सवालों पर लोकविद्या विचार से जो समझ बनी है, उसे यहाँ साझा किया गया है।

पिछली सदी के अंतिम दशक में वाराणसी और आस-पास के जिलों में नारी विद्या संस्थान और नारी हस्तकला उद्योग समिति की ओर से महिलाओं के बीच संगठन का कार्य शुरू हुआ। उद्देश्य यह था कि स्त्रियों की दृष्टि से सार्वजनिकता के नये मायने और विचार बनें। क्योंकि हमारी समझ यह बनी कि आधुनिक शिक्षा, आधुनिक बाज़ार व उद्योग और राजनीति से पाले-पोसे गए आज के सार्वजनिक जीवन में सामान्य स्त्रियों के लिए कोई जगह नही है और यह उनके लिए उपेक्षा, उत्पीड़न, हर तरह की असुरक्षा और शोषण का कारण बना हुआ है तथा उन्हें निष्क्रिय बनाने का आधार बन गया है। 20वीं सदी के कुछ आंदोलनों की सीख हमें इस नतीजे तक ले गई कि पूरे स्त्री-समाज के लिए न्याय व सम्मानपूर्ण समाज बने इसका आधार सामान्य स्त्रियों की  सक्रियता में है. और ऐसी सक्रियता के रास्तों का  पुनर्निर्माण उनके अपने ज्ञान से ही संभव है .  स्त्री – ज्ञान और लोकविद्या-बाजार के विचारों में सामान्य स्त्रियों की सक्रियता की असीम संभावनाएं सामने आईं।

आधुनिक ज्ञान (साइंस) की सैद्धांतिक चौखट में सामान्य स्त्री में बसे ज्ञान भंडार को देखने और उसमें छिपी शक्ति को पहचानने की अवधारणाएं और तरीके नही हैं, जिनके अभाव में वे स्त्रियों के कार्यों को मात्र प्राकृतिक क्षमता, हुनर और पारंपरिक ज्ञान के रूप में ही देख पाते हैं। चूंकि प्रगति की अवधारणाएं केवल आधुनिक ज्ञान में ही मानी गई हैं इसलिए इससे अन्य ज्ञान के रूप पिछड़े, अतार्किक, अप्रासंगिक और अमान्य माने जाते हैं . इसी में स्त्री-समाज के उत्पीडन और शोषण के आधार हैं। इस हालत से निकलने के रास्तों की खोज में स्त्री-ज्ञान की अवधारणा को आकार मिला। स्त्री-ज्ञान की अवधारणा को सामान्य स्त्रियों की सामाजिक स्वायत्तता, सक्रियता और न्यायपूर्ण हैसियत को आकार देने वाली बुनियाद के रूप में देखा और तब स्त्री-दृष्टि से सार्वजनिकता गढ़ने के मार्ग खुलते नज़र आये। उद्योग, शिक्षा, पोषण, चिकित्सा व स्वास्थ्यरक्षा जैसे क्षेत्रों में सामान्य स्त्री के ज्ञान (लोकविद्या) के बल पर सार्वजनिकता गढ़ी जाये तो उसकी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सुरक्षा तो मज़बूत होती ही है, समाज में एक सम्मानपूर्ण स्थिति की पक्की बुनियाद बनती है.

आगे इस विचार के बल पर समाज की उन ज्ञानधाराओं (किसान, कारीगर, आदिवासी समाजों की ज्ञान धाराओं) को पहचान पाने में मदद मिली, जिन्हें आधुनिक ज्ञान के तहत ज्ञान ही नही माना गया। समाज में बहती ये असंगठित ज्ञान धाराएं मिलकर लोकविद्या कहलाती हैं। इन असंख्य ज्ञानधाराओं के बीच और सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में व्याप्त ऊँच-नीच खत्म हो इसके लिए आवश्यक है कि समाज के संगठन और संचालन में इन ज्ञानधाराओं (जिनमें स्त्री-ज्ञान धारा भी है ) की बराबरी से भागीदारी हो सके, ऐसी सार्वजनिकता का रास्ता बनाया जाए। लोकविद्या-बाजार का विचार और कार्यक्रम इसी आधार पर विकसित हुआ। इसमें आज से भिन्न एक ऐसी सार्वजनिकता को बनाने की संभावना दिखाई देती है जिसमें सहजता और प्रकृति के लय में जीने के ज्ञान को प्रतिष्ठा हो और समाज की उत्पादन व  वितरण की व्यवस्थाओं तथा संचालन की संस्थाओं में स्त्री-ज्ञान का पूर्णतः समावेश हो। लोकविद्या-बाजार अभियान और ज्ञान पंचायत के तहत उठाये गए कार्यक्रम और मुद्दों के मार्फत इन प्रयासों की चर्चा की गई है

चित्रा सहस्रबुद्धे , लोकविद्या जन आंदोलन, वाराणसी

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