दर्शन अखाड़ा उद्घाटन

गंगा जी के दर्शन-उर्वर तट पर वाराणसी में विद्या आश्रम ने एक दर्शन अखाड़ा बनाने का कार्य शुरू किया है. इस दर्शन अखाड़ा के उद्घाटन पर आप सादर आमंत्रित हैं. शुक्रवार, 8 मार्च को शाम 5 से 7 बजे के बीच उद्घाटन कार्यक्रम है. स्थान  है — ए 11/13 नया महादेव, राजघाट, वाराणसी ( भैंसासुर घाट पर रविदास मंदिर से दशाश्वमेध की ओर बढ़ते ही ).

देश और दुनिया की स्थिति व दर्शन की प्रासंगिकता पर संवाद के जरिये अखाड़े का उद्घाटन किया जायेगा. दर्शन अखाड़ा शुरू करने का सांदर्भिक विचार पेश किया जायेगा तथा उस पर और इस अखाड़े की निर्माण प्रक्रिया पर विचार विमर्श होगा.

अवश्य आयें और वार्ता को समृद्ध बनायें.

दो शुरूआती शब्द

दर्शन अखाड़ा दर्शन वार्ता का स्थान है. यह दर्शन की धाराओं में संवाद और भाईचारा बनाने और रचना के नए रास्ते खोजने का स्थान है. दर्शन की अलग-अलग धाराओं का दर्शन अखाड़े में स्वागत है.

दर्शन अखाड़ा वह स्थान है जहाँ से समाज के नेतृत्व और सामान्य लोगों के बीच दार्शनिक संवाद की  वास्तविकता, आवश्यकता और संभावना को रेखांकित किया जायेगा.

दर्शन अखाड़ा में सामाजिक और राजनैतिक हलचलों  के दार्शनिक पक्ष पर चर्चा की जाएगी. यह समाज, कला, ज्ञान, भाषा, राजनीति, धर्म, शिक्षा, अर्थ, जीवनशैली इत्यादि क्षेत्रों से सम्बंधित दर्शन-वार्ता का स्थान है.

      विद्या आश्रम                                                            निवेदक

सा 10/82, अशोक मार्ग                             सुनील सहस्रबुद्धे          गोरखनाथ यादव

सारनाथ, वाराणसी                                   9839275124                9450542636

दर्शन अखाड़ा

ऐसा कहा जाता है कि आज तकनीकी और विशेषज्ञता का दौर है. ऐसा कहने वाले व्यापक मानव हित तथा दर्शन इत्यादि पर चर्चा को गैरज़रूरी समझते हैं . तथापि वास्तविकता यह है कि सभी कार्यों में कोई न कोई दर्शन निहित होता है और मानव जीवन पर होने वाले दूरगामी नतीजे भी निहित होते हैं . व्यापक बहस और दर्शन से किनारा कसना आत्मघाती है. प्रकृति के विनाश और मनुष्य और मनुष्य के बीच भयानक अंतर ये सब ऐसे ही नतीजे हैं . दूसरे महायुद्ध के बाद, यानि 20 वीं सदी के उत्तरार्ध में, दुनिया की पुनर्रचना में दर्शन को उचित स्थान नहीं दिया गया, न पश्चिम में और न नवोदित राष्ट्रों में. यह एक बड़ा कारण है कि आज दुनिया गरीबी, गैर-बराबरी, भयानक युद्धों और जलवायु संकट से घिरी हुई है .

20 वीं सदी के पूर्वार्ध में साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद से संघर्ष के दौरान वैश्विक दक्षिण के अनेक देशों में दर्शन पर व्यापक चर्चाएं हुईं हैं . इनमें से बहुत सी अपनी स्वदेशी परम्पराओं की समकालीन पुनर्रचना के रूप में सामने आईं. 1939 से 1945 के बीच यूरोप से शुरू हुए महायुद्ध के बाद तमाम उपनिवेश स्वतंत्र हुए तथा साम्राज्यवाद को पीछे हटना पड़ा और अनेक देशों में आज़ाद सरकारें बनी. किन्तु इन देशों में पश्चिम जैसी राज्य प्रणाली तथा विश्वविद्यालयों में पश्चिमी सोच के दबदबे के चलते स्वदेशी दार्शनिक परम्पराओं का स्थान समाज में गौण हो गया. इससे समाज की प्रमुख धारा और सामान्य लोगों के बीच का दार्शनिक संवाद टूटता चला गया. यह एक भीषण परिस्थिति है जिसमें समाज के उत्थान और पुनर्रचना के लोकप्रिय मूल्यों का निर्माण रुक जाता है और समाज एक अवनत अवस्था में किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है. ऐसा नहीं है कि इस दौर में हुई वार्ताओं का स्वदेशी के विचार के साथ कुछ लेना-देना नहीं है . जन आंदोलनों के अंतर्गत तथा लोकहित के मुद्दों पर संघर्षों के सन्दर्भ में बुनियादी सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक चर्चाएं हुईं, किन्तु ये चर्चाएं स्वदेशी दार्शनिक परम्पराओं से न जुड़ सकीं.

20 वीं सदी के अंत में वैश्विक स्तर पर बड़े आर्थिक, राजनैतिक और तकनीकी (इन्टरनेट) परिवर्तनों के साथ एक नए युग की शुरुआत हुई है जिसे हम संवाद का युग कह सकते हैं. इस दौर में जहाँ एक तरफ पश्चिम में उपजी और दुनियाभर में फैली कई दर्शन धाराओं की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े होने लगे, वहीँ दर्शन की स्वदेशी धाराओं से प्रेरणा लेने के मौके पैदा हुए हैं, हालाँकि सामान्य लोगों के साथ दार्शनिक संवाद टूटने का संकट बहुत बड़ा है. इसके चलते विचारों के पुनर्निर्माण और दर्शन के पुनरोदय के स्रोत सूखे नज़र आते हैं. ऐसे समय में दर्शन पर खुल कर बहस की आवश्यकता होती है. यह आवश्यक होता है कि दर्शन समाज में एक शक्ति के रूप में उभरे. इन्हीं सन्दर्भों में दर्शन अखाड़ा अपनी भूमिका देखता है. 

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