भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका – बैठक का जायज़ा

 

स्वदेशी दर्शन परम्पराएं और मूल्य आधारित राजनीति

28 मई 2019 को शाम 5 बजे

        28 मई 2019 को शाम 5 बजे दर्शन अखाड़ा, राजघाट, वाराणसी पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ. विषय था – भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका : स्वदेशी दर्शन परम्पराएं और मूल्य आधारित राजनीति.

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लोकसभा चुनाव नतीजों के सन्दर्भ में यह बैठक आनन-फानन में ही तय हुई थी और सूचना केवल एक दिन पहले ही दी जा सकी थी इसलिए कई लोग नहीं आ पाये. उपस्थित थे – अमरनाथ भाई, योगेन्द्र नारायण शर्मा, मो. आरिफ, मिथिलेश दुबे, रामजनम, फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, प्रेमलता सिंह, चित्रा सहस्रबुद्धे, लक्ष्मण प्रसाद, गोरखनाथ, अरुण कुमार और सुनील सहस्रबुद्धे.

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स्वदेशी दर्शन परम्पराओं से हमारा अभिप्राय गाँधी, कबीर, रविदास, तथा इन जैसे संतों के दर्शन से रहा. इस विचार गोष्ठी में भी राजनीति में दर्शन की भूमिका की बात करते हुए इन्हीं लोगों के दर्शन की ओर ध्यान खींचा गया. विश्वविद्यालयों में या तो इन्हें पढाया नहीं जाता है, या फिर हिंदी, इतिहास, राजनीति शास्त्र जैसे विभागों में पढाया जाता है, दर्शन विभाग में नहीं. इसके चलते और यूरोपीय विचारों के प्रभाव के चलते पढ़े-लिखे लोग इन्हें दार्शनिकों के रूप में सहजता से नहीं देख पाते. जो वैचारिक स्थापनाएं राजनीति में प्रासंगिक हो सकती हैं उन्हें अधिकांश 18 वीं औरे 19 वीं सदी के यूरोप से लिया जाता है और अपने दार्शनिकों के विचार समाज और व्यक्ति स्तर पर ग्राह्य तो माने जाते हैं लेकिन राजनीति में उनकी भूमिका नहीं देखी जाती.

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हम राजनीतिक सन्दर्भों में सत्य, प्रेम, अहिंसा, न्याय, भाईचारा जैसे विषयों पर कम ही बात करते हैं. अब सत्याग्रह की बात भी सामाजिक संघर्षों से बाहर हो चली है. इन्हीं स्थितियों पर गौर करने के लिए और आवश्यक सुधार की दृष्टि से एक बहस शुरू करने के इरादे से यह चर्चा रखी गई थी और वैसा ही हुआ. जो उभर कर आया वह यह था कि हमें राजनीतिक बहस और क्रियाओं के लिए नए प्रस्थान बिंदु चाहिए. ऐसे प्रस्थान बिंदु जो दर्शन को लोकमन और सामान्य जीवन के इतने नज़दीक देखें कि दार्शनिक व्याख्याओं और राजनैतिक चर्चाओं के बीच अंतर मिटने लगें. लोगों ने कहा कि यह बड़ा प्रश्न है और किसी एक बैठक में ऐसे प्रस्थान बिंदु खोज लिए जायेंगे, यह नहीं हो पायेगा. इसके लिए ऐसी बैठकों का सिलसिला चलना चाहिए और नए-नए लोगों को विमर्श में जोड़ा जाना चाहिए.

अगले दिन फिर इसी विषय पर विद्या आश्रम में अमरनाथ भाई, मो. आरिफ, नूर फातमा, लक्ष्मण प्रसाद, चित्रा जी और सुनील की आपस में बातचीत हुई.

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