त्यौहार और जीवनमूल्य

साल भर के त्यौहारों पर नज़र डालें तो बहुत से त्यौहार तो ऐसे हैं जो प्रकृति से हमारे सम्बन्ध को दृढ़ करते हैं जैसे संक्रांत, लोढ़ी, पोंगल, वसंत पंचमी, नाग पंचमी, रंगभरी एकादशी, गंगा दशहरा, गुरू पूर्णिमा, डाला छठ, शरद पूर्णिमा आदि। हरतालिका, जिउतिया, नवरात्र आदि जैसे त्यौहार प्रजनन-पालन-पोषण से जुड़े बताये जाते हैं। प्रत्येक अमावस्या और पूर्णिमा, चन्द्र व सूर्य ग्रहण स्नान-दान के माने जाते हैं। कुछ त्यौहार देवताओं या महान संतों के नाम से होते हैं। इन सभी त्यौहारों का सम्बन्ध भारत की दर्शन परम्पराओं से रहा है। दूसरी तरफ कुछ त्यौहार ऐसे हैं जो किसी के वध के जश्न हैं, जैसे होलिका दहन, नरकासुर वध (नरक चतुर्दशी), महिषासुर वध (दुर्गा), रावण वध (दशहरा), आदि। भारत में ये त्यौहार आजादी के बाद ही सार्वजनिक तौर पर मनाये जाने लगे हैं और इन्हें ही भारत के प्रमुख त्यौहारों में गिनाया जाने लगा है। क्या किसी के वध (चाहे वह दुश्मन हो) का जश्न मनाने वाली संस्कृति महान हो सकती है? क्या हमें अपने त्यौहारों पर मनन करने की जरूरत नही है?

विद्या आश्रम पर 29 अक्टूबर को दोपहर 3 बजे से ‘त्यौहार और जीवन मूल्य’ विषय पर गोष्ठी रखी गई थी।

सामाजिक कार्यकर्ता, किसान और कारीगरों के मिलेजुले इस समूह (लगभग 50 की संख्या) में हुई इस चर्चा की शुरुआत हुई।

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स्वराज अभियान के रामजनम की अध्यक्षता में हुई इस गोष्ठी में भारतीय किसान यूनियन के लक्ष्मण प्रसाद ने कहा कि आज त्यौहार सामान्य जन के लिए आनंद नही बल्कि एक संकट के रूप में आते हैं, इन पर बाजार और राजनीति का स्पष्ट कब्ज़ा देखा जा सकता है। कमाई कुछ नही और त्यौहारों में मौज-मस्ती और चकाचौंध का प्रदर्शन प्रमुख स्थान लेते जा रहे हैं। इन त्यौहारों के मार्फत राजनीतिक दबाव हमें पाखंडी बनाने के जाल बुन रहे हैं। ऐसे में त्यौहार कैसे मनाये जाएं इस पर विचार करना आवश्यक है। अध्यापक शिवमूरत ने त्यौहारों को बाजार की गिरफ्त से छुड़ाने के लिए एक आंदोलन की आवश्यकता को रखा। लोकविद्या आंदोलन की प्रेमलता सिंह ने कहा कि त्यौहार साथ-साथ जीने के लिए होते हैं, साथ-साथ समृद्ध होने का संदेश देते हैं। ये समाज में उल्लास व रचनात्मकता के स्रोत हैं और समाज के कल्याण के लिए हैं। वध का जश्न मनाने वाले त्यौहार समाज में आक्रामकता और बदले की भावना को पैदा व मज़बूत करते हैं। इन्हें नया रूप देना चाहिए।

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पारमिता ने अपने गांव का उदाहरण देते हुए कहा कि गांव में रामलीला होती थी लेकिन रावण का पुतला नही जलाया जाता था। पुतला जलाना यह शहरी रिवाज़ है। कारीगर नज़रिया के Iएहसान अली ने कहा कि त्यौहार इबादत के लिए है, ख़ुदा से सही राह दिखाने की गुजारिश है, ये अध्यात्म है। इसमें किसी को मारने का जश्न या बदला लेने की बात के लिए जगह कहाँ है? मोहम्मद अहमद ने कहा कि आज के दिन हम मोहर्रम के बाद पचासा मनाते हैं और इस दिन शहर से तलवार चलाते और अन्य शस्त्रों से लैस होकर हज़ारों की संख्या में लोग शहर के बीच से जूलूस निकालते हैं। यह त्यौहार भी वध के बदला लेने की बात को दृढ़ करता प्रतीत होता है। हम इसे ठीक नही मानते। हज़ार वर्ष पहले हुई वध की घटना का बदला आज क्यों ? गुलज़ार भाई ने इस बात का समर्थन करते हुए कहा कि त्यौहार राजनीति के हथियार और बाजार के गुलाम न बने इस पर सोच बनाने की ज़रूरत है। विनोद कुमार ने कहा कि त्यौहारों को खेलों से जोड़ने के प्रयास हों तो विध्वंसकारी प्रवृत्तियों पर काबू करने का एक रास्ता खुलेगा।
काशी विद्यापीठ के सांख्यिकी विभाग के अध्यापक रमन ने कहा कि हम बचपन से रामलीला देखते हुए बड़े हुए हैं, अब इसके बारे में जो नया विचार आज सुनने को मिला है उस पर सोचने के लिए अधिक समय देने की ज़रूरत है। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यापक रामाज्ञा ससिधर ने लोक और लोकविद्या के कुछ पहलुओं को उजागर करते हुए कहा कि त्यौहार में जो कर्मकांड आध्यात्मिकता को बढ़ाते हैं उनसे एतराज़ करने की ज़रूरत नही है। चित्रा सहस्रबुद्धे ने कहा कि वध के जश्न वाले त्यौहार होलिका दहन, दिवाली, दुर्गा पूजा आदि सार्वजनिक तौर पर देश भर में मनाना तो आज़ादी के बाद शुरू हुआ है। इसके पहले ये त्यौहार शायद भारत भर में प्रमुख त्यौहार के रूप में मनाए भी न जाते हो। हमें आज सोचना चाहिए कि क्या ये वध के जश्न में मनाए जाने वाले त्यौहार हमारे भारतीय होने की पहचान हैं या ये हाशिये के त्यौहार हैं?
सुनील सहस्रबुद्धे ने कहा कि त्यौहारों को सार्वजनिक क्षेत्र की संस्कृति पर एकाधिकार का औजार बनाना सर्वथा अनुचित है। अक्सर ऐसा एकाधिकार सांस्कृतिक उन्माद को जन्म देता है। जिस तरह लोकतंत्र में विपक्ष के बगैर लोकतंत्र ही नही रह जाता उसी तरह धर्म और संस्कृति आदि समाजोपयोगी भूमिका में रहें इसके लिए इतर दृष्टियों से समीक्षा और आलोचना का बड़ा महत्व है। भारतीय समाज में हमेशा से ये स्थितियां रही हैं, जो स्वराज की नियामक शक्तियों का काम करती रही हैं। आज़ादी के बाद से पूंजीवाद के त्वरित विकास के दौर में अर्थ से लेकर राजनीति और संस्कृति तक एकाधिकार की शक्तियों ने जोर पकड़ा।अलग-अलग मुखौटों में यह एकाधिकार बढ़ता चला गया। हमें उस सांस्कृतिक आंदोलन की ज़रूरत है, जो त्यौहारों को सांस्कृतिक एकाधिकार को चुनौती का एक औजार भी बना दे।
अंत में रामजनम ने अपने अध्यक्षीय भाषण में गोष्ठी को अत्यंत प्रासंगिक बताते हुए कहा कि हम खुद को और अपने समाज को सही ढंग से पहचान पाए और भविष्य को गढ़ने के न्यायपूर्ण मार्ग चुन सकें इसके लिए इन मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए।

विद्या आश्रम

 

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