बड़े सब सोच गए हैं !

हम जब समाज के बारे में कुछ सोचने-समझने लगे थे उन दिनों की बात है। हमारे घर एक पंडितजी आये। अपने समाज में वे विद्वान माने जाते थे। उन्हें वेद, पुराण और नीतिशास्त्र की गहरी जानकारी थी। सभी लोग उनका सम्मान करते थे। जैसा की अक्सर भेट मुलाकातों में लोग वर्तमान व्यवस्थाओं पर बातचीत करते हैं, इनके प्रति असंतोष जताते हैं या आलोचना करते हैं वैसी ही उनसे भी चर्चा होने लगी। हमारे चाचा कहने लगे कि नया सोचना सीखना होगा तभी समाज की गड़बड़ियां दूर की जा सकेंगी। इस पर बात होने लगी तो पंडितजी गंभीरता से बोले कि नया क्या सोचना है सब तो वेदों में लिखा ही है , केवल उसे जीवन में कैसे उतारें, बस्स यही काम करना है।
पंडितजी के जाने के बाद हम आपस में कई दिनों तक मज़ाक किया करते कि सब कुछ तो जाना-समझा है बस, करना ही बाक़ी है!

आगे कुछ वर्षों में सामाजिक – राजनीतिक हलचलों में भाग लेने के अवसर मिले और कई तरह के लोगों और विचारधाराओं से सामना हुआ। लेकिन पंडितजी हर बार सामने आ जाते, रूप बदल कर !

एक गंभीर व अत्यंत विनम्र गांधीवादी बुज़ुर्ग मिले जिनकी राय थी कि गांधीजी ने ग्रामस्वराज का विचार दिया है, बस उस पर काम करने की ज़रूरत है, सारी समस्याओं का हल निकल जायेगा। दलित संगठन के एक व्यक्ति ने बाबासाहेब के विचारों में मानवता के  पूर्ण कल्याण का दावा किया। एक मार्क्सवादी क्रांतिकारी विचारों के समझदार समझे जाने वाले कार्यकर्ता का यह कहना था कि विचार तो है ही, संगठन के लिए निकलना है, बस।
लेकिन समय बदल चुका है। नवीनीकरण और नवनिर्माण की क्रियाओं के बारे में भी तो सोचना होगा।
आज की राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था कुछ ही लोगों को ऐशोआराम और सुविधाएं जुटाती है और ऐसा करने में सामान्य लोगों के जीवन को तहस-नहस कर दे रही हैं। हमारी चुनी हुई सरकारें  ही हमारे खिलाफ़ कार्य करती हैं। ये व्यवस्थाएं अन्यायी हैं। क्योंकि इनके तहत किसान, कारीगर, मज़दूर, दुकानदार , आदिवासी, महिलाएं सभी  का जीवन बदहाली और अनिश्चितता के अंधेरो में तेजी से धकेला जा रहा है। दिल्ली की केंद्रीय सरकार और सभी राजनैतिक दल इस व्यवस्था के लिए ज़िम्मेदार हैं।

क्या मूल ग्रंथों के विचार और महापुरुषों के कार्यों को दोहराने से  लोकोन्मुख बदलाव आ सकेगा? क्या सामान्य लोगों के जीवन को खुशहाल और न्यायपूर्ण बनाने का आज का विचार लोगों की सोच और ज्ञान (लोकविद्या) से निर्लिप्त होकर आएगा? लोगों की पहल उनके अपने ज्ञान में नही होगी तो क्या बदलाव लोकोन्मुख होगा ?

अब काफी बुज़ुर्ग हो चले चाचाजी से वार्ता के दौरान यह निकल कर आया कि महापुरुषों या मूल ग्रंथों से उजाला ज़रूर मिलता हैं लेकिन रास्ता तो सामान्य जीवन के बीच से ही बनाना होता है। जो बना ले जाये वही न्याय की स्थापना का नेतृत्व कर पाता है। फिर विचार और कार्य कभी अलग नही किये जाते, करेंगे तो नतीजे ही नही निकलेंगे और यदि निकलें भी तो लोकहित में नही जा पाएंगे। और विचार कहाँ से आएंगे? लोगों के सामान्य जीवन से ही। यहीं पर विचार, कार्य और दर्शन का फलदायी संगम होता है।

चित्रा सहस्रबुद्धे

 

दर्शन अखाड़ा क्या है ?

  • दर्शन अखाड़ा दर्शन की धाराओं में संवाद और भाईचारा बनाने और रचना के नए रास्ते खोजने का स्थान है. दर्शन की अलग-अलग धाराओं का दर्शन अखाड़े में स्वागत है.
  • दर्शन अखाड़ा वह स्थान है जहाँ से समाज के नेतृत्व और सामान्य लोगों के बीच दार्शनिक संवाद की संभावना, वास्तविकता और आवश्यकता को रेखांकित किया जायेगा. 
  • दर्शन अखाड़ा में हर सामाजिक हलचल के दार्शनिक पक्ष पर चर्चा की जाएगी.
  • दर्शन अखाड़ा समाज, कला, ज्ञान, भाषा, राजनीति, धर्म, शिक्षा, अर्थ, जीवनशैली इत्यादि क्षेत्रों से सम्बंधित दर्शन-वार्ता का स्थान है .
  • ‘दर्शन’ का अर्थ अधिकांश भारतीय भाषाओं के लोग समझते हैं. हो सकता है कि कुछ भाषाओं में समानार्थी शब्दों पर जाना पड़े. दर्शन आध्यात्मिक और व्यावहारिक दोनों एक साथ होता है. वह वैयक्तिक और सामाजिक दोनों एक साथ होता है. विचार दार्शनिक तभी होता है जब वह सीमाओं में नहीं बंधता. दर्शन को किसी शैक्षणिक योग्यता, विशेषज्ञता अथवा समाज में विशेष स्थान की आवश्यकता नही होती. दर्शन अखाडा सहज बुद्धि से दुनिया को देखने का प्रयास है. यह देखने का प्रयास है कि दुनिया को बेहतर बनाने के लिए आज मनुष्य और समाज की शक्ति के स्रोत क्या हैं और कहाँ हैं ?
  • सहज बुद्धि और शक्ति के स्रोत दोनों उतने ही परिवर्तनशील होते हैं जितना परिवर्तनशील सामान्य समाज व जीवन होता है. इसलिए हम आशा करते हैं कि यहाँ दर्शन के वे रूप सामने आयेंगे जिन्हें किन्हीं पूर्व मान्यताओं के अंतर्गत समझना अथवा स्थापित करना एक असहज कार्य होगा.

दर्शनवार्ता क्यों ?

ऐसा कहा जाता है कि आज तकनीकी और विशेषज्ञता का दौर है. ऐसा कहने वाले व्यापक मानव हित तथा दर्शन इत्यादि पर चर्चा को गैरज़रूरी समझते हैं . तथापि वास्तविकता यह है कि सभी कार्यों में कोई न कोई दर्शन निहित होता है और मानव जीवन पर होने वाले दूरगामी नतीजे भी निहित होते हैं . व्यापक बहस और दर्शन से किनारा कसना आत्मघाती है. प्रकृति के विनाश और मनुष्य और मनुष्य के बीच भयानक अंतर ये सब ऐसे ही नतीजे हैं . दूसरे महायुद्ध के बाद, यानि 20 वीं सदी के उत्तरार्ध में, दुनिया की पुनर्रचना में दर्शन को उचित स्थान नहीं दिया गया, न पश्चिम में और न नवोदित राष्ट्रों में. यह एक बड़ा कारण है कि आज दुनिया गरीबी, गैर-बराबरी, भयानक युद्धों और जलवायु संकट से घिरी हुई है .

20 वीं सदी के पूर्वार्ध में साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद से संघर्ष के दौरान वैश्विक दक्षिण के अनेक देशों में दर्शन पर व्यापक चर्चाएं हुईं हैं . इनमें से बहुत सी अपनी स्वदेशी परम्पराओं की समकालीन पुनर्रचना के रूप में सामने आईं. 1939 से 1945 के बीच यूरोप से शुरू हुए महायुद्ध के बाद तमाम उपनिवेश स्वतंत्र हुए तथा साम्राज्यवाद को पीछे हटना पड़ा और अनेक देशों में आज़ाद सरकारें बनी. किन्तु इन देशों में पश्चिम जैसी राज्य प्रणाली तथा विश्वविद्यालयों में पश्चिमी सोच के दबदबे के चलते स्वदेशी दार्शनिक परम्पराओं का स्थान समाज में गौण हो गया. इससे समाज की प्रमुख धारा और सामान्य लोगों के बीच का दार्शनिक संवाद टूटता चला गया. यह एक भीषण परिस्थिति है जिसमें समाज के उत्थान और पुनर्रचना के लोकप्रिय मूल्यों का निर्माण रुक जाता है और समाज एक अवनत अवस्था में किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है. ऐसा नहीं है कि इस दौर में हुई वार्ताओं का स्वदेशी के विचार के साथ कुछ लेना-देना नहीं है . जन आंदोलनों के अंतर्गत तथा लोकहित के मुद्दों पर संघर्षों के सन्दर्भ में बुनियादी सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक चर्चाएं हुईं, किन्तु ये चर्चाएं स्वदेशी दार्शनिक परम्पराओं से न जुड़ सकीं.

20 वीं सदी के अंत में वैश्विक स्तर पर बड़े आर्थिक, राजनैतिक और तकनीकी (इन्टरनेट) परिवर्तनों के साथ एक नए युग की शुरुआत हुई है जिसे हम संवाद का युग कह सकते हैं . इस दौर में जहाँ एक तरफ पश्चिम में उपजी और दुनियाभर में फैली कई दर्शन धाराओं की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े होने लगे, वहीँ दर्शन की स्वदेशी धाराओं से प्रेरणा लेने के मौके पैदा हुए हैं, हालाँकि सामान्य लोगों के साथ दार्शनिक संवाद टूटने का संकट बहुत बड़ा है. इसके चलते विचारों के पुनर्निर्माण और दर्शन के पुनरोदय के स्रोत सूखे नज़र आते हैं . ऐसे समय में दर्शन पर खुल कर बहस की आवश्यकता होती है. यह आवश्यक होता है कि दर्शन समाज में एक शक्ति के रूप में उभरे. इन्हीं सन्दर्भों में दर्शन अखाड़ा अपनी भूमिका देखता है.

दर्शन की यह चर्चा सुगम रहे इसके लिए कुछ विषयवार प्रस्तुति अथवा लेखन की व्यवस्था यहाँ की गई है . कला, भाषा, ज्ञान, सामान्य जीवन, स्वराज आदि ये विषय हैं . दर्शन की चर्चा वैसे तो अविभाज्य है और इन विषयों के अंतर्गत बात करते हुए भी हम विषयों में बंध जायें यह ज़रूरी नहीं है.