रपट : देश की वर्तमान परिस्थिति और भविष्य

वाराणसी में देश की वर्तमान परिस्थिति और भविष्य पर 29 फरवरी 2020 को विद्या आश्रम, सारनाथ और 1 मार्च 2020 को दर्शन अखाड़ा, राजघाट में एक राजनैतिक और दार्शनिक वार्ता का आयोजन किया गया. देश भर में पिछले दो-तीन महीनों से CAA/NRC/NPR के विरोध में हो रही गतिविधियों की पृष्ठभूमि में और हम कौन हैं और किधर चले विषय पर शुरू हुई वार्ताओं के सन्दर्भ में समाज के कई तबकों से और देश भर से आये लोगों ने आगे के रास्ते और एक सार्थक परिवर्तन की संभावना पर अपने विचार रखे. लगभग 75 व्यक्तियों की भागीदारी में यह संवाद हुआ. वार्ता में 25 से 70 के आस पास के आयुवर्ग के लोग शामिल रहे.

यह महसूस किया गया कि सरकार के वर्तमान कदम और सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त विरोध दोनों ही पिछले समय से नाता तोड़ते नज़र आते हैं और एक राष्ट्रीय समाज के रूप में हम कौन हैं और किधर जाना चाहते हैं? यह सवाल उठ खड़ा हुआ है. वार्ता में शुरू से यह आग्रह रहा कि इसकी समझ बनाने के लिए उच्च शिक्षा संस्थानों और समाज वैज्ञानिकों से मार्गदर्शन लेने की जगह यह ज्यादा महत्वपूर्ण होगा कि हम इसे सामान्य लोगों, उनका जीवन और उनके विचारों के राजनीतिक-दार्शनिक सन्दर्भ में अवस्थित करने का प्रयास करें.

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मंजू सुन्दरम जी का विशेष व्याख्यान

सुरेश और सिवरामकृष्णन ने बंगलुरु में चल रहे ‘पवित्र आर्थिकी सत्याग्रह’ की बात के साथ चर्चा शुरू की. यह सत्याग्रह हाथ के काम और उन्हें करने वालों के पक्ष में एक आर्थिक-सामाजिक आन्दोलन है. इस आन्दोलन ने सीएए/एनआरसी के विरोध का समर्थन किया है तथा उसमें एक महत्वपूर्ण पक्ष जोड़ने का प्रयास किया है. देश में चल रहे सीएए/एनआरसी के विरोध के आन्दोलन के सन्दर्भ में कई भागीदारों ने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान सरकार हिंदुत्व की वैचारिकी से प्रभावित होकर एक विनाशकारी रास्ता अपना रही है और इस देश में सभी पंथों और धर्मों के लोगों की आपसी सौहार्द के जीवन की जो परंपरा है उसे ख़त्म करने पर तुली हुई है. कई तबकों के लोग यह सोचते हैं कि सी.ए.ए., एन.आर.सी. और एन.पी.आर. का पैकज उनके अस्तित्व के लिए ही खतरा है. इसलिए इसका विरोध जिन लोगों ने और जितनी मजबूती से खड़ा किया है उसकी उम्मीद शायद किसी को नहीं थी. यह किसी प्रकार के “वाद” से बंधा हुआ नहीं है और इसने देशप्रेम की नयी परिभाषा दी है. यह मुख्यधारा के वर्तमान पक्षों को पीछे छोड़ आया है. ख़ास कर शाहीन बाग़ की महिलाओं ने यह दिखा दिया है कि जो लोग मुस्लिम समाज की स्त्रियों को सार्वजनिक मंच से कटा हुआ समझते हैं वे कितने ग़लत हैं. इन महिलाओं ने न सिर्फ राजनैतिक पक्षों को बल्कि अपने समाज के लीडरों को भी पीछे छोड़ दिया है. उनकी शक्ति के स्रोत क्या हैं यह समझने की ज़रुरत है. क्या यह एक नई प्रेरणा का स्रोत है?

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स्वराज विद्यापीठ, इलाहाबाद और आज़ादी बचाओ आन्दोलन के मनोज त्यागी

वक्ताओं ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि यह आंदोलन केवल मुसलमानों का नहीं है. ये नए कानून और सरकार के प्रयास सिर्फ मुसलमान समाज के लिए ही नहीं, बल्कि देश के तमाम किसानों, कारीगरों, आदिवासियों, स्त्रियों और छोटे धंधे वालों के लिए समस्या पैदा करते हैं. इन लोगों के पास अथाह ज्ञान, विद्या और हुनर तो है, लेकिन कागज़ नहीं हैं. इस लिए “कागज़ नहीं दिखाएंगे” का नारा इस लोकविद्याधारी समाज का नारा है. इस आंदोलन के मार्फ़त समाज सरकार से कह रहा  है “हमारे ही देश से हमें बेदखल करने का विचार त्याग दें”. यह बात भी सामने आयी कि सीएए  के मुद्दे तक सीमित न रह कर इस आंदोलन को सरकार की अन्य नीतियों जैसे नोटबंदी, जीएसटी आदि की पार्श्वभूमि में देखा जाए.

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कानपूर से मज़दूरों के बीच कार्य रत                                    स्वराज अभियान के राम जनम

मनाली चक्रवर्ती

वार्ता में यह बात भी उभर कर आयी कि हिंदुत्ववादी सोच का मुक़ाबला करने और देश के विविध सम्प्रदायों के बीच भाईचारे के सम्बन्ध बनाने और अधिक मजबूत करने के लिए जिन मूल्यों और व्यवहार के तरीकों की ज़रुरत है, वह हमें सामान्य जीवन में और लोक परम्पराओं तथा लोकस्मृति में मिलते हैं. भारत में ऐसे भाईचारे की परम्परा  है जिसे  हिन्दुत्ववादी सोच नकारती है. लेकिन अगर हम महाभारत से कुछ सीखते हैं तो वह यह कि जब घर ही में युद्ध होता है तो किसी की जीत नहीं होती, सबकी हार होती है. वक्ताओं ने कहा की आर्थिक विषमताओं, बेरोज़गारी, और कॉर्पोरेट सेक्टर के फायदे  के लिए बनी आर्थिक नीतियों को भी चुनौती देने की ज़रुरत है. ये ऐसे हालात पैदा करती हैं जिनमें युवा नफरत और हिंसा की ओर गुमराह किये जाते हैं. यह एक लम्बी लड़ाई है.

यह भी कहा गया कि केवल संवैधानिक मूल्यों को पकड़कर देश बहुत दूर तक नहीं जा सकता. जिस उदारतावाद और प्रगतिशीलता से हम परिचित हैं वह अब और आगे देश को किसी नए रास्ते पर ले जा सकेगा इसकी संभावना नहीं दिखाई देती. उदार और सकारात्मक मूल्यों के स्रोत के रूप में हमें सामान्य लोगों के बीच प्रचलित परम्पराओं की ओर देखने का मन बनाना चाहिए, खासकर संत-परंपरा की ओर. केवल इतना ही नहीं बल्कि वर्तमान आन्दोलन में कलाकारों की भूमिका यह कहती नज़र आती है कि देश और दुनिया को कला दर्शन की दृष्टि से देखना ज़रूरी है. इस सन्दर्भ में श्रीमती मंजू सुन्दरम जी का एक विशेष व्याख्यान रखा गया था. श्रीमती मंजू सुन्दरम कला और भाषा के क्षेत्रों में विशेष दखल रखने वाली एक दार्शनिक विदुषी हैं. वे उपस्थित लोगों को एक ऐसी कला की दुनिया में ले गईं जहाँ से बातों को समझने और देखने के लिए प्रचलित राजनैतिक और आर्थिक श्रेणियों से अलग वैचारिक श्रेणियों के बीच खुद को ले जाना पड़ता है. ‘दर्शन’, ‘भाव’ और ‘मर्यादा’ की बातें करते हुए उस वैचारिक दुनिया का निर्माण किया जिसमें विश्लेषणात्मक तरीके का महत्त्व तो है लेकिन औरों की तरह ही, उनसे अधिक नहीं. पूरी सुबह राजनैतिक दृष्टिकोण से बात चल रही थी और कला की दुनिया का यह दखल ताज़ी हवा के एक झोंके की तरह था तथा वार्ता को एक बड़ी दुनिया में ले गया. इनके तुरत बाद आते हुए राहुल राज ने विश्लेषणात्मक वैचारिकी के द्वंद्वों के ऊपर उठने में दर्शन की भूमिका को रेखांकित किया. अंत में चित्रा सहस्रबुद्धे ने कहा कि रचनात्मक पहल के लिए जिस सार्वजनिक और सबको शामिल करने वाले संवाद की ज़रूरत है उसे बनाने के लिए एक ज्ञान आन्दोलन की ज़रूरत है, एक ऐसे ज्ञान आन्दोलन की जिसमें लोकविद्या और नैतिकता को अहम् स्थान मिलता हो. इसे हम बौद्धिक सत्याग्रह का नाम दे सकते हैं, जिसमें कला दर्शन और संत वाणी की बड़ी भूमिका है.

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लोकविद्या के दावे का गीत गाते लोकविद्या जन आन्दोलन के कार्यकर्त्ता

कार्यक्रम  के दूसरे दिन लोकतंत्रसमाजवादरामराज्य, और स्वराज पर गंगाजी के किनारे दर्शन अखाडा में वार्ता हुई. यहाँ उपस्थित लोगों ने इन अवधारणाओं और व्यवस्थाओं पर अपनी-अपनी समझ रखी. लगभग 50 लोगों की उपस्थिति में बोलने वाले अधिकांश लोगों ने जीवन और समाज के संगठन के रूप में स्वराज के प्रति अपनी प्राथमिकता दर्शाई. लोकविद्या जन आन्दोलन के मैसूर से आये बी. कृष्णराजुलु ने बैठक की शुरुआत करते हुए यह कहा कि आज सभी देशों में लोकतंत्र एक दलीय तानाशाही में बदल रहा है. उन्होंने इस कथन के समर्थन में कई देशों के उदाहरण दिए, जहाँ अलग-अलग विचारधाराओं के दल राज कर रहे हैं. IISER मोहाली  से आये वैभव ने बाज़ार की नकारात्मक भूमिका को रेखांकित किया और कहा कि इस बाज़ार की व्यवस्था समझे और बदले बगैर मानव हित में आगे बढ़ना संभव नहीं है. स्वराज विद्यापीठ, इलाहाबाद के मनोज त्यागी ने कहा कि स्वराज की ओर बढ़ने में सबसे बड़ी बाधा कारपोरेशन हैं. उन्होंने स्वराज विद्यापीठ द्वारा ‘लोक राजनीति मंच’, ‘जन-संसद’ और ‘छोटे उद्यम’ के रूप में किये गए प्रयोगों के बारे में बताया. स्वराज अभियान के राम जनम ने कहा कि ‘एक व्यक्ति-एक वोट’ की वास्तविकता और वैचारिकी दोनों की ही सीमाएं हैं और स्वराज की ओर बढ़ने के लिए इनसे आगे बढ़ना होगा. भारतीय किसान यूनियन के लक्ष्मण प्रसाद ने उदाहरणों के साथ यह बताया कि छोटी से छोटी समस्या हल करने में वर्तमान सरकारी तंत्र पूरी तरह अक्षम है और यह कि स्थानीय लोगों की पहल पर ही कुछ काम हो पाता है. इसे संगठन का रूप देने से स्वराज की ओर बढ़ने के कदम तैयार होते हैं. विद्या आश्रम की चित्रा सहस्रबुद्धे ने स्वराज परंपरा की बात की. उन्होंने कहा कि स्वराज का विचार बनाने में और उसके व्यवहार के सिद्धांत समझने के लिए गाँधी के अलावा बसवन्ना के कल्याण राज्य, रविदास के बेगमपुरा, कबीर की अमरपुरी, अंग्रेजों के आने से पहले के ‘भाईचारा गाँव’ और आज़ादी के पहले औंध, मिरज और कुछ और स्थानों पर स्वराज के जो प्रयोग हुए उन सब पर ध्यान देना चाहिए. अविनाश झा ने कहा कि लोकतंत्र और स्वराज के बीच का अंतर ‘स्वनियंत्रित’ और ‘स्वगठित’ इन दोनों के अंतर से समझा जा सकता है. स्वनियंत्रित व्यवस्था बाहर से दिए हुए सिद्धांत के तहत चलती है. मगर एक स्वगठित व्यवस्था अपने अंदर ही अपने संगठन के मूल्यों का निर्माण करती है. स्वराज एक स्वगठित व्यवस्था की ओर इशारा करता है.

वार्ता सभा का समापन करते हुए उन सब लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया गया जो भाग लेने आये थे और जिन्होंने इस वार्ता के लिए आवश्यक सारे इंतजाम किये.

इस दो दिन के संवाद के लिए कई लोगों ने रहने-खाने और बातचीत के स्थान की व्यवस्था की. वे हैं – गोरखनाथ, फ़िरोज़ खान, मु. अलीम, नीरजा, आरती कुमारी, अंजू देवी, कमलेश, पप्पू, मल्लू, चम्पादेवी, रोहित, कुलसुमबानो, विवेक और प्रिंस.

[ इस संवाद में कई लोग बोले और कई के नाम इस छोटी सी रिपोर्ट में नहीं आये हैं. जो लोग बोले वे हैं—सुनील सहस्रबुद्धे, ज.क.सुरेश, जी.सिवरामकृष्णन, गिरीश सहस्रबुद्धे, वैभव वैश्य, राहुल राज, हरिश्चंद बिंद, मनोज त्यागी, मनाली चक्रवर्ती, मुनीज़ा खान, पारमिता, नीति भाई, संदीपा, अवधेश कुमार, लक्ष्मीचंद दुबे, फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, एहसान अली, ब्रिकेश यादव, मु. अहमद, अमित बसोले, निमिता कुलकर्णी, अरुण चौबे, प्रेमलता सिंह, आरती कुमारी, वीणा देवस्थली, राहुल वर्मन, राम जनम, अभिजित मित्रा, चित्रा सहस्रबुद्धे, अविनाश झा, बी. कृष्णराजुलु. कुछ ऐसे विचार ज़रूर होंगे जो व्यक्त किये गए लेकिन इस रिपोर्ट में नहीं हैं. इसका कारण केवल यह है कि हमारे पास विस्तार से लिखित ब्यौरा नहीं हैं. पूरी वार्ता का एक विडियो बनाया गया है लेकिन अभी हम नहीं जानते कि उसका क्या इस्तेमाल किया जाय. सुझावों का स्वागत है.]

विद्या आश्रम

 

 

 

 

संत रविदास जयंती के अवसर पर ज्ञान-वार्ता

9 फरवरी को रविदास जयंती है। रविदास जी के जन्म स्थान बनारस में इस दिन बहुत बड़े-बड़े उत्सव होते हैं। इस महान संत की स्मृति में उनके दर्शन पर चर्चा के लिए दर्शन अखाड़े पर 4 फरवरी को लगभग 30 व्यक्ति एकत्र हुये. संत रविदास जी के निम्नलिखित पद को चर्चा में रखा गया था. ज़ाहिर है चर्चा उसी तक सीमित नहीं रही.

नामहि पूजा कहाँ चढ़ाऊँ, फल अरु फूल अनुपम न पाऊँ l

दूधत बछरयो थनहु जुठारयो, पुहुप भँवर, जल मीन बिगारयो ll

मलयागिरि बांधियो भुजंगा, विष अमृत बसइ इक संगा l

मनहि पूजा, मनहि धूप, मनहि से सेऊँ सहज सरूप ll

तोडूं न पाती, पूजूं न देवा, सहज समाधि करूं हरी सेवा l

पूजा अरचा न जानूं तोरी, कह ‘रैदास’ कौन गति मोरी ll

1. Ravidas Jayati Darshan aakhada

राजकुमार के नेतृत्व में सरायमोहना गाँव की मंडली रविदास पद गाते हुए

वार्ता की शुरुआत राजकुमार के नेतृत्व में सरायमोहना गाँव की रविदास गायक मण्डली के सुन्दर भजनों से हुई. गुरु रविदास जन्मस्थान मंदिर, सीरगोबर्धनपुर, वाराणसी के आचार्य भारत भूषण दास ने संत रविदास के आध्यात्मिक दर्शन को विस्तार से रखा. मध्ययुगीन भारत के इतिहासकार डॉ. मोहम्मद आरिफ ने वर्तमान राजनीतिक एवं सामाजिक विषमता के सन्दर्भ में संत रविदास के दर्शन के महत्व को अनेक उद्धरण और पदों का ज़िक्र करते हुए सामने लाया. ज्ञान की दुनिया में विश्वविद्यालय के दब-दबे को चुनौती देने में रविदास दर्शन का महत्व विद्या आश्रम की समन्वयक डॉ. चित्रा सहस्रबुद्धे ने अपने वक्तव्य में सामने रखा। सभा के सह अध्यक्ष सतीश कुमार उर्फ़ फगुनीराम-व्यवस्थापक संत रविदास मंदिर, राजघाट, ने वार्ता के लिए दिए गये पद में उजागर भाव को रस्मों का विरोध और ईश्वर से सीधे संबंध के रूप में व्याख्या की.

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सुनील सहस्रबुद्धे ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि भारत की दार्शनिक परंपरा में संतों का बहुत बड़ा योगदान रहा है लेकिन चूंकि विश्वविद्यालय इसका अवमूल्यन करते हैं इसलिये दर्शन अखाड़े ने इसके न्यायोचित स्थान के लिए अभियान चलाया है.

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समय अभाव के कारण गोष्ठी में आये व्यक्तियों में प्रेमलता सिंह, नूर फातमा, शीलम झा,एहसान अली,  प्रवाल सिंह, महेंद्र प्रसाद, राजकुमार, लक्ष्मण प्रसाद जैसे कई ज्ञानी व्यक्तियों को बोलने का समय नहीं मिल पाया.

गोष्ठी के अंत में आमंत्रित वक्ताओं और गायक मंडली के सदस्यों को एक गमछा व साहित्य देकर सम्मानित किया गया. गोष्ठी के स्थान पर ही तिलमापुर के पंकज कुमार मौर्य ने वहां संत साहित्य की कुछ पुस्तकों को प्रदर्शन के लिए रखा.

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आरती ने इस ज्ञान-वार्ता  में आये सभी भागीदारों का  स्वागत किया और दर्शन अखाड़े के व्यवस्थापक गोरखनाथ ने सबके प्रति आभार व्यक्त करते हुये गोष्ठी का समापन किया और सभी ने जलपान किया.

निमंत्रण : विद्या आश्रम में गंगा आन्दोलन पर वार्ता

गंगा आन्दोलन पर वार्ता

 

दिन : गुरुवार, 12 दिसम्बर 2019

समय : दोपहर 2 बजे 

मुख्य वक्ता 

संदीप पाण्डेय (सामाजिक कार्यकर्त्ता ) और हरिश्चंद्र बिंद (राष्ट्रीय सचिव, माँ गंगा निषादराज सेवा समिति) 


विद्या आश्रम पर 12 दिसंबर 2019 को दोपहर 2 बजे ‘निर्मल-अविरल गंगा’ आन्दोलन पर वार्ता रखी गई है. संदीप पाण्डेय अपनी बात रखेंगे. हरिश्चंद्र बिंद भी अपनी बात रखने आ रहे हैं. आप अपनी बात रखें इसके लिए हम आपको आमंत्रित करते हैं.

हरिद्वार के मातरु सदन के सन्यासी गंगाजी में अवैध खनन के विरोध में और निर्मल-अविरल गंगा के पक्ष में लगातार प्राणाहुति दे रहे हैं. संदीप भाई मात्रि सदन के साथ इस गंगा आन्दोलन में सक्रिय हैं. उन्होंने इस विषय पर एक पुस्तक बनाई है, जो जल्दी ही छपेगी. फ़िलहाल अंग्रेजी में है, नाम है – Tradition of Saints Making Sacrifices for Ganga. हिंदी में भी जल्दी ही बनेगी. आप में से कई इस विषय पर सोचते हैं और आन्दोलन के पक्ष में सहयोग की भूमिका में रहे हैं. 


जैसा कि आप समझते हैं गंगा आन्दोलन एक समग्र आन्दोलन है. बड़ी तादाद में लोगों की जीविका का आन्दोलन है, जीवन मूल्यों का आन्दोलन है, पर्यावरण-पारिस्थितिकी संतुलन का आन्दोलन है, आर्थिक-सामाजिक संरचना में दखल का आन्दोलन है और विद्या की अपनी परम्पराओं के प्रति सम्मान का आन्दोलन है.


12 दिसम्बर की दोपहर संरक्षित कर लें और इस वार्ता के लिए विद्या आश्रम, सारनाथ अवश्य आयें. वार्ता समय से शुरू होगी. दोपहर बाद लोगों को कहीं-कहीं जाना है.


विद्या आश्रम 

त्यौहार और जीवनमूल्य

साल भर के त्यौहारों पर नज़र डालें तो बहुत से त्यौहार तो ऐसे हैं जो प्रकृति से हमारे सम्बन्ध को दृढ़ करते हैं जैसे संक्रांत, लोढ़ी, पोंगल, वसंत पंचमी, नाग पंचमी, रंगभरी एकादशी, गंगा दशहरा, गुरू पूर्णिमा, डाला छठ, शरद पूर्णिमा आदि। हरतालिका, जिउतिया, नवरात्र आदि जैसे त्यौहार प्रजनन-पालन-पोषण से जुड़े बताये जाते हैं। प्रत्येक अमावस्या और पूर्णिमा, चन्द्र व सूर्य ग्रहण स्नान-दान के माने जाते हैं। कुछ त्यौहार देवताओं या महान संतों के नाम से होते हैं। इन सभी त्यौहारों का सम्बन्ध भारत की दर्शन परम्पराओं से रहा है। दूसरी तरफ कुछ त्यौहार ऐसे हैं जो किसी के वध के जश्न हैं, जैसे होलिका दहन, नरकासुर वध (नरक चतुर्दशी), महिषासुर वध (दुर्गा), रावण वध (दशहरा), आदि। भारत में ये त्यौहार आजादी के बाद ही सार्वजनिक तौर पर मनाये जाने लगे हैं और इन्हें ही भारत के प्रमुख त्यौहारों में गिनाया जाने लगा है। क्या किसी के वध (चाहे वह दुश्मन हो) का जश्न मनाने वाली संस्कृति महान हो सकती है? क्या हमें अपने त्यौहारों पर मनन करने की जरूरत नही है?

विद्या आश्रम पर 29 अक्टूबर को दोपहर 3 बजे से ‘त्यौहार और जीवन मूल्य’ विषय पर गोष्ठी रखी गई थी।

सामाजिक कार्यकर्ता, किसान और कारीगरों के मिलेजुले इस समूह (लगभग 50 की संख्या) में हुई इस चर्चा की शुरुआत हुई।

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स्वराज अभियान के रामजनम की अध्यक्षता में हुई इस गोष्ठी में भारतीय किसान यूनियन के लक्ष्मण प्रसाद ने कहा कि आज त्यौहार सामान्य जन के लिए आनंद नही बल्कि एक संकट के रूप में आते हैं, इन पर बाजार और राजनीति का स्पष्ट कब्ज़ा देखा जा सकता है। कमाई कुछ नही और त्यौहारों में मौज-मस्ती और चकाचौंध का प्रदर्शन प्रमुख स्थान लेते जा रहे हैं। इन त्यौहारों के मार्फत राजनीतिक दबाव हमें पाखंडी बनाने के जाल बुन रहे हैं। ऐसे में त्यौहार कैसे मनाये जाएं इस पर विचार करना आवश्यक है। अध्यापक शिवमूरत ने त्यौहारों को बाजार की गिरफ्त से छुड़ाने के लिए एक आंदोलन की आवश्यकता को रखा। लोकविद्या आंदोलन की प्रेमलता सिंह ने कहा कि त्यौहार साथ-साथ जीने के लिए होते हैं, साथ-साथ समृद्ध होने का संदेश देते हैं। ये समाज में उल्लास व रचनात्मकता के स्रोत हैं और समाज के कल्याण के लिए हैं। वध का जश्न मनाने वाले त्यौहार समाज में आक्रामकता और बदले की भावना को पैदा व मज़बूत करते हैं। इन्हें नया रूप देना चाहिए।

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पारमिता ने अपने गांव का उदाहरण देते हुए कहा कि गांव में रामलीला होती थी लेकिन रावण का पुतला नही जलाया जाता था। पुतला जलाना यह शहरी रिवाज़ है। कारीगर नज़रिया के Iएहसान अली ने कहा कि त्यौहार इबादत के लिए है, ख़ुदा से सही राह दिखाने की गुजारिश है, ये अध्यात्म है। इसमें किसी को मारने का जश्न या बदला लेने की बात के लिए जगह कहाँ है? मोहम्मद अहमद ने कहा कि आज के दिन हम मोहर्रम के बाद पचासा मनाते हैं और इस दिन शहर से तलवार चलाते और अन्य शस्त्रों से लैस होकर हज़ारों की संख्या में लोग शहर के बीच से जूलूस निकालते हैं। यह त्यौहार भी वध के बदला लेने की बात को दृढ़ करता प्रतीत होता है। हम इसे ठीक नही मानते। हज़ार वर्ष पहले हुई वध की घटना का बदला आज क्यों ? गुलज़ार भाई ने इस बात का समर्थन करते हुए कहा कि त्यौहार राजनीति के हथियार और बाजार के गुलाम न बने इस पर सोच बनाने की ज़रूरत है। विनोद कुमार ने कहा कि त्यौहारों को खेलों से जोड़ने के प्रयास हों तो विध्वंसकारी प्रवृत्तियों पर काबू करने का एक रास्ता खुलेगा।
काशी विद्यापीठ के सांख्यिकी विभाग के अध्यापक रमन ने कहा कि हम बचपन से रामलीला देखते हुए बड़े हुए हैं, अब इसके बारे में जो नया विचार आज सुनने को मिला है उस पर सोचने के लिए अधिक समय देने की ज़रूरत है। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यापक रामाज्ञा ससिधर ने लोक और लोकविद्या के कुछ पहलुओं को उजागर करते हुए कहा कि त्यौहार में जो कर्मकांड आध्यात्मिकता को बढ़ाते हैं उनसे एतराज़ करने की ज़रूरत नही है। चित्रा सहस्रबुद्धे ने कहा कि वध के जश्न वाले त्यौहार होलिका दहन, दिवाली, दुर्गा पूजा आदि सार्वजनिक तौर पर देश भर में मनाना तो आज़ादी के बाद शुरू हुआ है। इसके पहले ये त्यौहार शायद भारत भर में प्रमुख त्यौहार के रूप में मनाए भी न जाते हो। हमें आज सोचना चाहिए कि क्या ये वध के जश्न में मनाए जाने वाले त्यौहार हमारे भारतीय होने की पहचान हैं या ये हाशिये के त्यौहार हैं?
सुनील सहस्रबुद्धे ने कहा कि त्यौहारों को सार्वजनिक क्षेत्र की संस्कृति पर एकाधिकार का औजार बनाना सर्वथा अनुचित है। अक्सर ऐसा एकाधिकार सांस्कृतिक उन्माद को जन्म देता है। जिस तरह लोकतंत्र में विपक्ष के बगैर लोकतंत्र ही नही रह जाता उसी तरह धर्म और संस्कृति आदि समाजोपयोगी भूमिका में रहें इसके लिए इतर दृष्टियों से समीक्षा और आलोचना का बड़ा महत्व है। भारतीय समाज में हमेशा से ये स्थितियां रही हैं, जो स्वराज की नियामक शक्तियों का काम करती रही हैं। आज़ादी के बाद से पूंजीवाद के त्वरित विकास के दौर में अर्थ से लेकर राजनीति और संस्कृति तक एकाधिकार की शक्तियों ने जोर पकड़ा।अलग-अलग मुखौटों में यह एकाधिकार बढ़ता चला गया। हमें उस सांस्कृतिक आंदोलन की ज़रूरत है, जो त्यौहारों को सांस्कृतिक एकाधिकार को चुनौती का एक औजार भी बना दे।
अंत में रामजनम ने अपने अध्यक्षीय भाषण में गोष्ठी को अत्यंत प्रासंगिक बताते हुए कहा कि हम खुद को और अपने समाज को सही ढंग से पहचान पाए और भविष्य को गढ़ने के न्यायपूर्ण मार्ग चुन सकें इसके लिए इन मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए।

विद्या आश्रम

 

विद्या आश्रम पर दर्शन वार्ता 12-14 अक्टूबर 2019

घोषणा के अनुरूप 12 – 14 अक्टूबर को विद्या आश्रम, सारनाथ में दर्शन वार्ता हुई। 

विचार के प्रमुख बिंदु रहे —- स्वायत्तता, न्याय, ज्ञान-पंचायत, लोकस्मृति, कला दर्शन, सामान्य जीवन, स्वराज, नारी-विद्या, संत परंपरा व शास्त्रीय दर्शन और लोक भाषा। दर्शन स्तर की समाज के लिए प्रासंगिक चर्चाएं हुईं। टेक्नॉलॉजी तथा मनुष्य निर्मित संस्थाओं और वर्तमान राजनीति के विकल्प के लिए भारतीय दर्शन परम्पराओं, ज्ञान और विवेक के संदर्भों में ठोस विचार सामने आए और उन पर चर्चा हुई। 

बंगलुरु में हाथ से उत्पादन उद्योग के पक्ष में चल रहे आन्दोलन ने हस्त उद्योग, रोज़गार और प्रकृति संरक्षण को केंद्र में रखते हुए ‘पवित्र आर्थिकी’ के पक्ष में आवाहन किया है. इसके लिए ग्राम सेवा संघ के सरगना एवं जाने-माने कलाकार प्रसन्ना एक अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ चुके है. इस आन्दोलन में कला क्षेत्र की पारंगत एवं जानी-मानी हस्तियाँ शामिल हुई हैं. कई लोग उनके साथ उनके समर्थन में एक दिवसीय अनशन पर रहे. बंगलुरु से आये मित्रों ने इस आन्दोलन के बारे में बताया. यह बात सामने आई कि न वाम और न दक्षिण पंथ के अंतर्गत आने वाले इस आन्दोलन की प्रेरणा के स्रोत गाँधी हैं. यह आन्दोलन दर्शन के स्तर पर समाज में हस्तक्षेप कर रहा है. सरकार से कुछ मांग नहीं रहा है बल्कि देशवासियों से एक बात कह रहा है. विद्या आश्रम की दृष्टि में यह बौद्धिक सत्याग्रह का प्रकट और सार्वजनिक रूप है. पवित्र आर्थिकी के विचार पर चर्चा हुई. तीन दिन की इस दर्शन वार्ता में  केरल से पी.के.ससिधरन, चेन्नई से सी.एन. कृष्णन व विद्या दुराई, बंगलुरु से जे.के.सुरेश, जी.एस.आर. कृष्णन, राजकुमारी कृष्णन, हैदराबाद से अभिजित मित्रा, मुम्बई से वीणा देवस्थली, नागपुर से गिरीश सहस्रबुद्धे, इंदौर से संजीव दाजीऔर अंजलि, इलाहाबाद से स्वप्निल और राजेश  कपूर, असम से संचारी भट्टाचार्य, बंगाल से देबप्रसाद, बंदोपाध्याय, रूपा व आखर और दिल्ली से अविनाश ने शिरकत की. वाराणसी से सुनील सहस्ररबुद्धे, रमण  पन्त, अरुण चौबे, प्रवाल सिंह,  फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, लक्ष्मण प्रसाद, चित्रा,  प्रेमलता सिंह, आरती, गोरखनाथ, विनोद चौबे और अलीम, मऊ से अरविंद मूर्ति और उनके साथियों ने शिरकत की.  

पहले दिन इलाहाबाद से पीयूसीएल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रविकिरण जैन और आजकल वाराणसी रह रहे न्याय के दार्शनिक पी.के.मुखोपाध्याय दर्शन वार्ता में शामिल हुए और समापन के दिन वाराणसी के वरिष्ठ समाजवादी और पत्रकार विजय नारायण जी शामिल हुए.

13 अक्टूबर को गंगाजी के किनारे राजघाट पर अपने दर्शन अखाड़ा पर सब जने बैठे। वातावरण निर्मल और सुकून भरा था तो ज़रूर, पर पूरब में थोड़े बादल होने से शरद पूर्णिमा का चंद्रोदय हम लोग नही देख सके। आधे पौन घंटे बाद थोड़ा ऊपर आया हुआ चाँद अपनी पूरी आभा के साथ दिखाई दिया। लोकविद्या जन आंदोलन के दर्शन और कार्यक्रम पर चर्चा हुई। इसके बाद सबको खीर खाने को मिली। गोरखनाथ जी का विशेष प्रबंध था।

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12 और 14 अक्तूबर को विद्या आश्रम में दर्शन वार्ता 

 

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13 अक्तूबर को गंगाजी के किनारे दर्शन अखाड़ा पर दर्शन वार्ता

 

Listening to Philosophers

Listening to Philosophers : Dialogue in Varanasi 

Venue : Vidya Ashraaaam, Sarnath and Darshan Akhada, Rajghat. 

Date : 12-13-14 October 2019 , Saturday, Sunday, Monday.

13th is Sharad Poornima 
All those interested are invited.

 

Introductory Remarks

When all politics is bereft of ideological considerations, there is need of a philosophical intervention. When ordinary life gets very muddled and moral imperatives fail to provide the criteria of resolution, philosophical intervention becomes imperative and inevitable.  The world today appears to be in the grip of changes which have no promise for a better world.

What is the contemporary philosophical scene which may come to rescue? Where do we look for philosophers, who we should like to listen to?

Where we look for may be – new epistemological foundations in the wake of the emergence of the virtual world, reflections on the human condition in the wake of the new forms of oppression let loose by the New Empire, debates on Climate Justice, culturally rooted thought on economics and politics, holistic thought as against piecemeal, art as preferred way of thinking over science, lokavidya darshan when organized knowledge is seen as hand maiden of the state, neighbourhood as primary form of social organisation and the like.

Every department of human life and social organization has undergone huge changes since the appearance of the internet and the world wide web, close to 30 years ago. Economics, politics, trade, social organization, finance, industry, education, science research and finally also ordinary life, everything has undergone great changes. Vidya Ashram has tried to look at these changes by its research, investigations and dialogues pertaining to the world of knowledge, particularly the flux in it. In the process it encountered radically different approaches for understanding the world which had different epistemological perspectives and pointed towards new ontological constructions. New languages and idioms can be seen emerging to enable these approaches to be true to their contexts including the emancipatory needs of the people – farmers, women, artisans, service providers, workers, students, adivasis and those in the market doing business with tiny capital. One would often find that these approaches do not accept the riders of logic, values and methods of modern science. Some of these approaches are broadly mentioned below.

  • The Rights of Mother Earth and buen vivir that emerged in some countries of South America like Bolivia, Ecuador and part Colombia.
  • Lokavidya Jan Andolan in India – an explicitly epistemological movement creating the concept of lokavidya.
  • European Students Movement against corporatization of education creating the idea of Cognitive Capitalism.
  • La Via –Campesina, an international farmers organization and movement focusing on Climate Change and Food Sovereignty – suggesting a Swaraj like reorganization of societal priorities.

There are explicit philosophical writings in the context of these movements and phenomena. There is also wide ranging philosophical reflection which is not rooted explicitly in these phenomena. They come from different ends like: primacy of art in life and understanding, reassertion and innovation of traditional ways of practice and understanding by the subaltern classes, new critique of Science focussing on Information Technology, Bio-technology, Nano-science and Cognitive Science, network focussed ontology, primacy of communication over production leading to fundamental changes in how history and science need to be viewed etc.

It is suggested that this note be shared with persons who may be interested in this, seek their views on it and if they would be willing to contribute to shape this dialogue with philosophers and among philosophers. This discussion needs to be very open both on content as well as form of this ‘listening to philosophers’. It can be conceived on a global scale with virtual and actual forms intertwined.

Vidya Ashram

 

 

 

सामान्य जीवन, समाज बोध और प्रगति के मानक

प्रेमचंद का भारतीय चित्रकला पर ‘ ज़माना ‘ के अक्टूबर, 1910 के अंक में छपे एक लेख से —

    “भारत की राष्ट्रीय जागृति का सबसे महत्वपूर्ण और शुभ परिणाम वे बैंक और डाकखाने नहीं हैं जो पिछले कुछ सालों से स्थापित हुए और होते जाते हैं, न वे विद्यालय हैं जो देश के हर भाग में खुलते जाते हैं बल्कि वह गौरव जो हमें अपने प्राचीन उद्योग-धंधों और ज्ञान-विज्ञान और साहित्य पर होने लगा है और वह आदर का भाव जिससे हम अपने देश की कारीगरी के प्राचीन स्मारकों को देखने लगे हैं.”

यह वही समय है जब आनंद कुमार स्वामी भारतीय कला पर चर्चा के मार्फ़त एक स्वदेशी समाज दृष्टि प्रस्तुत कर रहे थे. यह वही समय है जब गांधीजी ने हिन्द स्वराज के मार्फ़त स्वदेशी समाज बोध को आकार दिया. भारत तब फिर से अपने उन दर्शनों की ओर मुड़ रहा था जो स्वदेशी समाज बोध और लोकप्रिय व लोकहितकारी प्रगति के मानक गढ़ने के आधार देते थे.
आगामी रविवार, 28 जुलाई को दर्शन अखाड़ा पर इन्हीं बातों की चर्चा की जानी है . प्रेमचंद के मार्फ़त भारतीय दर्शन की लोकोन्मुख और लोकप्रिय समझ के समकालीन रुपों की तलाश की जानी है.

प्रेमचंद का दर्शन : सामान्य जीवन, समाजबोध और प्रगति के मानक

दर्शन अखाड़ा पर एक वार्ता

28 जुलाई 2019

शाम 5 बजे

प्रेमचंद (जन्म 31 जुलाई 1880) वाराणसी शहर से सटे हुए लमही गाँव के निवासी थे. चूँकि 31 जुलाई को शहर में और लमही में कार्यक्रम होते हैं, हमने सोचा कि रविवार 28 जुलाई को कुछ बातचीत दर्शन अखाड़ा पर हो जाये. प्रेमचंद के दर्शन पर कुछ बात हो.

साहित्य, कला और सृजन के पीछे एक दर्शन और विश्व दृष्टि न हो तो वह कालजयी कैसे हो सकता है? आइये, प्रेमचंद को एक दार्शनिक के रूप में देखने का प्रयास किया जाए. खोजा जाये आज के लिए कैसी भावी दृष्टि की विरासत उनसे मिलती है. हमें लगा कि सामान्य जीवन, समाजबोध व प्रगति के मानक के सन्दर्भों में बातचीत से कुछ प्रस्थान बिंदु मिल सकते हैं.

विद्या आश्रम साहित्य में दर्शन की खोज का हिमायती है. हम उसकी जाँच की बात को ठीक नहीं समझते. दर्शन ढूंढ़ें तो अक्ल में कुछ इजाफा हो सकता है.

प्रेमचंद को कमोबेश हम सबने पढ़ा है. उनके लेखन पर चिंतन भी किया है. आपसे अनुरोध है कि एक डेढ़ पेज या दो पेज इस पर लिख कर भेजें. वार्ता में शामिल हों और अपनी बात कहें. फेसबुक पर ही लिखकर भेज दें या फिर विद्या आश्रम के ई–मेल vidyaashram@gmail.com पर.

सुनील सहस्रबुद्धे (9839275124)                                                        गोरखनाथ (9450542636)

दर्शन अखाड़ा स्थान : ए 11/13 नया महादेव, राजघाट, वाराणसी, राजघाट (भैंसासुर घाट) पर रविदास मंदिर से दशाश्वमेध की ओर बढ़ने पर सुलभ शौचालय के पीछे पंच अग्नि अखाड़ा के बीस कदम आगे

 

दर्शन अखाड़ा में कबीर ज्ञान पंचायत

वाराणसी का पंचगंगा घाट कबीर के ज्ञान प्राप्ति का स्थान माना जाता है. कबीर ज्ञान पंचायत के लिए यह सबसे उपयुक्त स्थान होता. इस बार हम इसे नहीं कर पाए, अगली बार यहाँ कबीर दर्शन से साक्षात्कार का आयोजन करने का प्रयास ज़रूर करेंगे. वाराणसी में पंचगंगा घाट से उत्तर-पूर्व दिशा में लगभग एक किलोमीटर दूर, राजघाट (भैंसासुर घाट) पर दर्शन अखाड़ा है. इस वर्ष कबीर जयंती (17 जून ) के चार दिन पूर्व 13 जून को दर्शन अखाड़ा में कबीर ज्ञान पंचायत रखी गई. इस कबीर ज्ञान पंचायत में वाराणसी के कुछ सामाजिक विचारक और कार्यकर्त्ता जुटे. आज की दुनिया में कबीर दर्शन से क्या उजाला मिलता है इस विषय पर सभी ने अपने-अपने विचारों को साझा किया. कबीर दर्शन ज्ञान और विचार की दुनिया में एक बहुत बड़ा फलक देता है, ऐसे में चर्चा के प्रस्थानबिन्दु के रूप में उनका एक पद पंचायत के सामने रखा गया.

मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे II

मैं कहता आंखन की देखी, तू कहता कागज़ की लेखी I

मैं कहता सुरझावनहारी, तू राख्यो उरझाई रे I

मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे II

मैं कहता जागत रहियो, तू रहता है सोई रे I

मैं कहता निर्मोही रहियो, तू जाता है मोई रे I

मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे II

बायें  से — महेंद्र मौर्य, अरुण कुमार, रामजनम, फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, एहसान अली. मतीन अंसारी, गोरखनाथ और मो. अलीम

कबीर ने अपने समय के स्थापित संगठित ज्ञान और सत्ता की सांठ-गांठ को चुनौती दी.  ज्ञान जिसे समाज का एक छोटा सा समूह ही हासिल कर पाता है और जिस ज्ञान का सत्ता से सीधा सम्बन्ध होता है उस समूह को अपने ज्ञान का अपार दंभ हो जाता है. वह खुद को समाज के अन्य लोगों से अलग करता है, अपने को विशेष समझता है, शेष समाज को मूर्ख समझता है. कबीर के समय यही स्थिति थी. उनके समय स्थापित ज्ञान बहुत कुछ धार्मिक घेरे में रहा, ऐसे में वे धर्म के ठेकेदारों को संबोधित करते दिखाई देते हैं. आज अगर कबीर होते तो किसे संबोधित करते? आज का प्रतिष्ठित ज्ञान विश्वविद्यालय का ज्ञान है. विश्वविद्यालय राजसत्ता के साथ सांठ-गांठ कर ज्ञान के ठेकेदार बने हुए हैं. ये राजसत्ता की नीतियों को समाज में मान्यता और आधार प्रदान करने के औजार हैं. इस ज्ञान का सत्य और न्याय से कोई लेना-देना नहीं है, लोगों की आवश्यकतायें और कष्टों से कोई लेना-देना नहीं है. अगर होता तो हमारी रोज़गार, उद्योग, शिक्षा, न्याय, चिकित्सा, आदि की नीतियां, गाँव और शहरों का संगठन और सम्बन्ध कुछ ही लोगों के लिए लाभ और सुविधा देने के लिए न बन गए होते. हम सभी जानते हैं कि गांधीजी ने भी अपने समय के प्रतिष्ठित ज्ञान और सत्ता के सम्बन्ध को अन्यायी और लोक विरोधी कह कर चुनौती दी.

बाएं से — प्रेमलताजी, चित्राजी, सरगम येर्रा और वनलता बुलुसु

आज के “कागज़ की लेखी” ज्ञान के वाहक और राजसत्ता से सुविधा प्राप्त समूह के ज्ञान और ज्ञान-संस्थानों को चुनौती “आंखन देखी” ज्ञान-परंपरा के वाहक समाजों से जब मिलेगी तो समाज के सभी तबकों और हिस्सों के लिए न्याय का रास्ता खुलेगा. पंचायत में विषय को रखते हुए सुनीलजी ने कहा कि इस चुनौती को पद की पहली पंक्ति “मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे” अपनी सम्पूर्णता में सामने लाती है. समाज को सभी तरह के ज्ञान की आवश्यकता है. ऐसे में किसी एक ही ज्ञान को प्रतिष्ठित किया जाये या ज्ञान की कसौटी बना दिया जाए तो यह अन्याय का रास्ता खोल देता है. ऐसे में प्रतिष्ठित ज्ञान और समाज में स्थित ज्ञान प्रवाहों के बीच बराबरी और मैत्री का सम्बन्ध आवश्यक है.

कबीर ज्ञान पंचायत में उपरोक्त पद का सन्दर्भ लेते हुए सभी लोगों ने अपने विचार रखे. महेंद्र प्रसाद मौर्य ने कहा कि कबीर ज्ञान की इजारेदारी का विरोध करते हैं. सबके पास ज्ञानेन्द्रियाँ हैं और हर कोई ज्ञान प्राप्त करता है. सबका ज्ञान अलग अलग होता है. यह अलग-अलग ज्ञान समाज के बीच आना चाहिए. हैदराबाद से इस पंचायत में शामिल होने आई वनलता ने सवाल उठाया कि ज्ञान पर सहमति के आधार क्या हों, इस पर भी विचार होना चाहिए. प्रेमलताजी ने इस बात पर जोर दिया कि ज्ञान को व्यक्तिगत पहचान के साथ न देख कर समाज के ज्ञान  के रूप में देखना होगा. लक्ष्मण प्रसाद ने कबीर के सहज ज्ञान की ओर सबका ध्यान खींचा और कहा कि सहज ज्ञान को समाज में प्रतिष्ठा मिलेगी तो पाखंड और अन्याय से मुक्ति का रास्ता खुलेगा. रामजनम ने कहा कि किसान और गाँव- समाज के पास जो ज्ञान है उसे न्याय मिलना चाहिए. गोरखनाथ ने कबीर के ज्ञान को सत्य से तपा और प्रेम से सिक्त हुआ कहा. एहसान भाई का जोर हमेशा की तरह नैतिकता पर था. कैसे भी दबाव के बावजूद सही और गलत की पहचान से ही रास्ता बने और अपने को बड़ा और दूसरे को छोटा न देखा जाए. फ़ज़लुर्रहमान अंसारी ने इस बात पर जोर दिया कि कबीर की ज्ञान परंपरा में हमें खुद को देखना होगा, न कि कबीर संस्थानों की परम्परा में. ऐसे में कारीगर और किसान समाजों को अपने ज्ञान को विश्वविद्यालय के ज्ञान के बराबर होने का दावा प्रस्तुत करना होगा. रास्ता चाहे लम्बा हो लेकिन यही सत्य का रास्ता है, यही कबीर का रास्ता है. अरुणजी ने कहा कि इन सभी बातों पर सहमति है लेकिन प्रमुख बात “मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे” में देखी जाये. लोकविद्या समाज और उच्च शिक्षित लोगों के बीच, उनकी विद्याओं के बीच मैत्री और सद्भाव का रिश्ता कैसे बने यह प्रमुख चिंता का विषय है. इसके लिए क्या क्रिया करनी चाहिए? बुनकर दस्तकार मंच के मतीन भाई ने कहा कि “मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे” यही आज जनसंगठनों और जन आंदोलनों का प्रमुख कार्य है. चित्राजी ने कहा कि इस पद से स्वराज की कल्पना को आधार मिलता दिखाई देता है. ऐसे समाज की कल्पना जिसमें विशेषज्ञों के बल पर नहीं बल्कि सामान्य जन के ज्ञान के बल पर सबकी अपनी-अपनी पहल के साथ भागीदारी हो. अंत में गोरखनाथ जी ने दर्शन अखाड़ा की ओर से सबके प्रति अपने आभार व्यक्त किये.

विद्या आश्रम

भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका – बैठक का जायज़ा

 

स्वदेशी दर्शन परम्पराएं और मूल्य आधारित राजनीति

28 मई 2019 को शाम 5 बजे

        28 मई 2019 को शाम 5 बजे दर्शन अखाड़ा, राजघाट, वाराणसी पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ. विषय था – भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका : स्वदेशी दर्शन परम्पराएं और मूल्य आधारित राजनीति.

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लोकसभा चुनाव नतीजों के सन्दर्भ में यह बैठक आनन-फानन में ही तय हुई थी और सूचना केवल एक दिन पहले ही दी जा सकी थी इसलिए कई लोग नहीं आ पाये. उपस्थित थे – अमरनाथ भाई, योगेन्द्र नारायण शर्मा, मो. आरिफ, मिथिलेश दुबे, रामजनम, फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, प्रेमलता सिंह, चित्रा सहस्रबुद्धे, लक्ष्मण प्रसाद, गोरखनाथ, अरुण कुमार और सुनील सहस्रबुद्धे.

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स्वदेशी दर्शन परम्पराओं से हमारा अभिप्राय गाँधी, कबीर, रविदास, तथा इन जैसे संतों के दर्शन से रहा. इस विचार गोष्ठी में भी राजनीति में दर्शन की भूमिका की बात करते हुए इन्हीं लोगों के दर्शन की ओर ध्यान खींचा गया. विश्वविद्यालयों में या तो इन्हें पढाया नहीं जाता है, या फिर हिंदी, इतिहास, राजनीति शास्त्र जैसे विभागों में पढाया जाता है, दर्शन विभाग में नहीं. इसके चलते और यूरोपीय विचारों के प्रभाव के चलते पढ़े-लिखे लोग इन्हें दार्शनिकों के रूप में सहजता से नहीं देख पाते. जो वैचारिक स्थापनाएं राजनीति में प्रासंगिक हो सकती हैं उन्हें अधिकांश 18 वीं औरे 19 वीं सदी के यूरोप से लिया जाता है और अपने दार्शनिकों के विचार समाज और व्यक्ति स्तर पर ग्राह्य तो माने जाते हैं लेकिन राजनीति में उनकी भूमिका नहीं देखी जाती.

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हम राजनीतिक सन्दर्भों में सत्य, प्रेम, अहिंसा, न्याय, भाईचारा जैसे विषयों पर कम ही बात करते हैं. अब सत्याग्रह की बात भी सामाजिक संघर्षों से बाहर हो चली है. इन्हीं स्थितियों पर गौर करने के लिए और आवश्यक सुधार की दृष्टि से एक बहस शुरू करने के इरादे से यह चर्चा रखी गई थी और वैसा ही हुआ. जो उभर कर आया वह यह था कि हमें राजनीतिक बहस और क्रियाओं के लिए नए प्रस्थान बिंदु चाहिए. ऐसे प्रस्थान बिंदु जो दर्शन को लोकमन और सामान्य जीवन के इतने नज़दीक देखें कि दार्शनिक व्याख्याओं और राजनैतिक चर्चाओं के बीच अंतर मिटने लगें. लोगों ने कहा कि यह बड़ा प्रश्न है और किसी एक बैठक में ऐसे प्रस्थान बिंदु खोज लिए जायेंगे, यह नहीं हो पायेगा. इसके लिए ऐसी बैठकों का सिलसिला चलना चाहिए और नए-नए लोगों को विमर्श में जोड़ा जाना चाहिए.

अगले दिन फिर इसी विषय पर विद्या आश्रम में अमरनाथ भाई, मो. आरिफ, नूर फातमा, लक्ष्मण प्रसाद, चित्रा जी और सुनील की आपस में बातचीत हुई.